11111111 11111111.

निवेदन

आज परिषद्‌ अल्यन्त पुनीत भावना के साथर्मोँ मारनी के चरणों "श्रीराम- कुमार भुवालका ग्रन्थमाछा के दितीय पुप्प को अर्पित करती है इस प्रन्थ- माला का प्रथम पुप्प था मुशीदेवीप्रसाद्‌ छरुत (मीराबाई का जीषनचरित्र” जिसे परिपद्‌ ने नव-सम्पादिति करके सन्‌ १९५४ मे प्रकादितं किया था। आदा कि हिन्दी साहित्य के उपवनकोये नवग्रस्फुटिन सुकुल सुरभित करेगे भौर श्री शारदा की माला मे अर्चना के नव- कुशुम परिषद्‌ के दारा जुते ही रहेगे

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(अनिका सत्यवती व्व

२१ ०११० {१

सारतवषं केवर अपनी भौगोलिक विचित्रता के चियि ही संसारके आकपण का केन्द्र नदीं रहा है, वरन्‌ इसके अतिरिक्त इसके जीवन मे ही युगो से कुछ एेसी विलक्षणता रदी है, कि जिसके कारण यहो कै सनन-शीख व्यक्तियों ने तथा विविध कछाकारों ने संसार को केव नवीन-दर्शन ही नहीं दिया, वरन्‌ नवीन-दश्िमी दी मस्य॑ोकका वासी मानव अमरता की अभिलाषा करे यह अपते आप कोई विशेष वात नहीं लेकिन यदि अमरता का वरदान प्राप्न करने मेँ सफर मी हो जये, तब तो इसे विधाता को मानव की चुनौती दी कहना पड़ेगा ।! भारत का सस्छृतिक इतिहास एेसी अमर विभूतियों की श्ुखछा से पग-पग पर आमण्डित दै युगो पे के वेद ओर उपनिषद्-काटीन ऋषि, वाल्मीकि ओर व्यास तथा उन्दी की परम्परा पाणिनि, भरतः, भासः काछिदासः, भवभूतिः सूर ओर तुरुसी इत्यादि अगणित रेते नाम खर्णाक्षरों मे च्चि हमे मिक्ते हैः जो पाथिव शरीर को छोड कर केव अपने यश से दी नहीं वरन्‌ अपनी ब्राणी की साधना को चये हृए आज मी हमारे साथदैं। यह्‌ तो नहीं कहा जा सकता किं एेसी विभूतियं केवल इसी देश को प्राप्त हैः प्रायः सभी समुन्नत एवं सभ्य देश ठेसे वरदानों के अधिकारी रहे है, किन्तु अपेक्षाछरत समय ओर संख्या के अनुपात मे भारत का भाग्य निश्चय ही अविक समुज्यल.र्दा दै

विनाशकादही दूस नास मृ्युदै, ओर अविनाश जीवन दै। शिव जीवन का पोषक है, अशिव विनाश का। यहु केवर व्यक्ति के जीवन का ही नहीं वरन्‌ विन्व-जीवन का रहस्य दै। शात्‌ सिद्धान्त

( )

यद दे कि कारण के अनुरूप दी कायं दोना चादधिये। छि के यदि कारण शिव ओर शक्ति अथवा प्रकृति ओर पुरुप अविनाशी हे, तव प्रशन उठना खामायिक दै कि उनकी शक्ति से विरचित यद्‌ जगत नाशवान्‌ क्यो है यह्‌ जिन्नासा चेतन्य मानव की शायद्‌ आदि कालसेदी र्दी है ओर उपनिषदों मे उत्तर यदी मिटा कि शिव ओर शक्ति का अनायास निरन्तर आंशिक योग दी प्रप॑चजन्य सृष्टि का मृ कारण हे! इस शान्त अनायास संयोग का प्रथम 'आभासः शिवप्त (आाक्रार है ओर शक्त्यांश का 'अमास' भ्रपच का द्वितीय तत्त ध्वायुः है (आकाशः ओौर्‌ वायुः का युग्म अपने करम से अभि, जठ ओर प्र्वी तत्य को उपस्ित करता दै ओर विविध रूपा सृष्टि प्रवयक्ष होती है ! ये गुह्य रहस्य वेद्‌-काीन ऋषियों को उदूभासित ज्ञान के रूपमे प्राप्त दो चुके ये, जिनकी अभिव्यक्ति प्रायः उसी काल से वाणी के उन वरद्-युत्रो के द्वारा श्राकृत ध्वनि चिः जो "ज्र के नाम से प्रसिद्ध दै, के माघ्यम्‌ से प्रस्तुत होकर मुरञ्चित ण्ठ प्रतिष्ठित की राद थी। इस रहस्य का परिचय इस चये ओर वण्यर हो जाता कि दम भारतीय वाद्खमय मे अनेक महत््व-पृणं चसे शब्द देखते च्छे रदे दै जो केवट ग॑भीराथीं दी नी, अत्यन्त गृढार्थी, तथा सकतीं के रूप मे युगो से ज्यवहत होते रट हं "काटः (कटाः' प्रस, "काटी" वाणी? इत्यादि अगणित शव्द जो हमारे हासा आज भी ज्यवहत शोते ह॑; उनके विपय सें सोचना पडता दे क्रि उनकी व्युत्पत्ति च्यो ओर केसे हु होगी ! केव उनी प्राचीनता ही नही वरन्‌ उनद्ी 'अथै-समृह्‌-वहता' मी अपना विणेप मद रलती है यही जिन्नासा हमे वाध्य करती टै किदहम टन विरिष्टं शव्या के गठन की अनि-प्राचीन पदति कौ जानने की चषा र} उम्रषठभृमि > एन रएल्टां व्यक्त समस्त भारतीय लानरारि दूसर टी खुप दमार्‌ सामने आदी हे। उस रदस्य समन्तत म॒ परम्परागन प्रचलित देवद्ाणी के विविध सीरत द्ान्री-क्नप वहन दूर नक्र दमारी सहायता ऋरते हर न्दी के

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( ) आधार पर यदि कालः" "काटी, ओर “कलाः शब्द पर्‌ विचार, किया जये तो सममने मे देर करगी कि अक्षर "कः प्रतीक दै शिव ओर शक्ति के उस अनायास संयोग से उदूभूत प्रथम तन्त शिवाश आकाशः का! उसमे "आ! की सत्रा का योग प्रसार का द्योतक दै। अक्षर आकाश अंश के साथ शशक्त्यांशः का प्रतीक है! "काड शब्द कां मूख अथं है श्रिशुणासिमिका शक्ति से युक्त व्याघ्र आकाशः जिसमें संयोग से उद्भूत जगत वतमान रहता हजा सतत्‌ क्रियाशीक दै; इसके तीन शाच्धत्‌ धम दै “ख्ि “सिति ओर (छ्य'। इसी को भारतीय वाङ्गमय कदा गया दै महा कारः! इस तात्तविक रहस्यालुभूति के पश्चात्‌ सारतीय ऋषियों को (1०८ ओौर 9१८९ जेसी सिति-हय की स्वीकृति की आवश्यकता केसे रहती ! उपयुक्त सिद्धान्त के आधार पर दी खर %& का सखीकृत अर्थं है शिव धमं 'अकर्षणः से भ्रलमन्वितः शक्तयाश॒ की व्ेवी-क्रियाः (काः के उपयुक्त अंश के साथ राक्तयांशा का र" से युक्त यह रूप सिद्ध करता है शब्द “कालीः, जिसका सूर अर्थं दै छि का वंह तासिः जो परम-आकषेण से युक्ते दै; अर्थात्‌ "कारी विश्व की वह परम सौन्दयै-मंयी (तास्िविक विभूति" हैः जिसका धमं॑दै “चिद्‌ाकर्षणः ओरं जिसकी प्रतिक्रिया है ख्ट-विश्वं की “रति-चेतनाः | इसी सिद्धान्त के आधार पर (कटाः को सी समना हदोगं शिवांशं क" (अर्थात आकाश) शक्त्यांश “छ (अर्थात त्रिगुणास्मिकां शक्ति) का से युक्त हो जाना अर्थात अति-व्याप्न होकर शछृजन शीला हो जाना दहै! (आकाश मे चरिगुणास्मिका शक्ति के “उदार प्रयोग से विविध रूपात्मकता की छष्टि ्दतुः अथवा “अभिकरणः कानामदै कठाः) सृजन चाहे शविधिः का हौ या मानव का, अपने मूर मे उपयुक्त तन्स्यों सन्तुखिति एवं आलुपातिक संगठन का दी आश्रयी ह, (संतुलन ओर "अनुपातः की सिरता मेही सष्ट शूप की सिरता है ओर इन दोनों के “विकार मे विनाश है! कलाकार अपनी रचनः

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की छष्टि भी इन्दं शाच्धत्‌ नियमों के आधार पर दी करता आया दे अर करता रहेगा दाका जं एक ओर (आकाशः कौ सूचना देना वीं शक्ति के व्रिगुणासक दोन का साक्षी भौ द। आ्धि-करत मे यदि शक्ति की सतोरण प्रधानता ताल्िक समन्वय की स्थिति की सूचना दै, तो उती शक्ति कौ ररजोगु्र^प्रधानताः अपनी सह प्रत्रियातकता के परिणाम-खल्प ताच्िवक सन्तुखन ओर अनु- पातकाञ्यरकरतीहे। ओर शक्तिकी ही चरृद्धिगत रजोगुण-प्रधान ्रक्रियान्मक्रता अनुपात ओर सन्तुखन मे एक सीमा कै वाद चिकार उन्न कर देती है सीमा सपर्णापरान्त प्रक्रियाद्मक आवतेन शपित्त का (तमोगुण वरत्त-प्रवेशः हे ओर ठससे उतपन्न चिकार जन्य विनाश न्रश्र-त्प करा परिवर्तनास्मक्र चिष्व॑स हे, ट्मारा मृ प्रभ्न ध्रा अविनाशी शिव ओर शक्ति के योगसे धतपन्न विन्ध-खषटि का चिनाश्च प्यो ओर कैसे उत्तर सपर हे- विश सृष्टिकेदेतु हं अचिनाशी शिव ओर शक्ति के संयोग से उदूभूत पंच-तरध, जो अपन क्रारण के अनुप ही अविनाशी है किन्तु उनसे निर्मित सूप परितर्वन-्तीट हाते की वजह से नाशवान दै इस परम ग्ट्म्य का यदि कोद्र केव जान कर ही सन्तुष्ट हो जयि, वरन्‌ उसके "दानिक म्म का अधिकारी हो जाये तो, निश्चय दी वह (महाकालः प्न नुनौती दे करता दै इसका निस्य सिद्ध माध्यम दै कटाः कीं माधनासे कारी' की उपासना। मंसाग के साहित्य मे जिन असर पिभूनियों के नाम समय को चुनोनी दिये अज तन हमे मिटते है उनकी उस अमरता क्रा रम्य उपरक्त खापनाकी अकाल्य साक्षी है | भारतीय कावठ्य-परस्परा अपनी प्राचीनना अर दिव्य प्रतिभा सम्प्नना अप्रतिम ठै। काट्दिास क्रानाम रिरमौरदहे। जनि करिति देनी ओर्‌ विरद इततिदा म-वेत्ता अपने जीवन अमल्य श्ण टत परम-प्रमिद्ध कवि का जीवन वर्त ग्योज निक्रायने मै खपा नु ?, जिन्त थोड़ी सौ प्रचलित किवदन्तियो द्योडकर अर कौ$ तथ्य उनक्र पल्टे पटा यदीं हमे मानना पडता क्रि किचदन्तिया

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भी अपना कितना अधिक मूल्य रखती हँ अति शक्तिशाखी सम्राट के पुराने से पुराने शिरटेख ओर ताम्नपत्र प्रभ्वी के गथ मे गे हुए जहो मोन दै, वहीं खोक प्रचलित किंवबदर्तिया हमारे स्मृति-पटरु पर अंकित होती हई आये दिन हमे आवश्यक ओौर उपयोगी ज्ञान से आरोकित करती रहती है कवि-ऊल-गुर कालिदास के संव॑ध में बटोरी गर समस्त किवद्न्तियो का सार केवर इतना ही निक्त दै कि वे जन्म से किसी अति-सामान्य प्ररिवार हठी व्यक्ति थे, देव संयोग से उनका संव॑ध अपने समय के सर्वश्रेष्ठ एवं शप्तिशारी राज्य परिवारसे हो गयां था। किवदन्तियां तो यह्‌ भी सुचना देती दै कि वे केवर निधन परिवार के ही व्यपति नहीं थे वरन्‌ विशि शिक्षा से भी युक्त नदीं थे! जेसी छोक-कथा दै राज-कन्या से असन्तुष्ट होकर राजपुरोहित (शायद वरादामिदिर ) ने वैमनस्य कारण परम विदुषी एवं तेजस्िनी राजङ्कुमारी का विवाह निपट अयोग्य व्यित से करा दिया था कालान्तर मे बद्दी व्यक्ति अपनी तपस्या के बल से विश्व-रमणीयता की अधिष्ठात्री देवी "कारी" का प्रसाद्‌ भाजन चन गया ओर उसे अङोकिक प्रतिभा का वरदान मिखा। यदी रहस्य दै जगत-प्रसिद्ध कवि-कुख-गुर काछिदिास के जीवन का इससे यह्‌ स्पष्ट हो जाता है कि “काडिदिास” जसा रोक-अप्रचङित नाम उस व्यपति का जन्म-नाम नहीं हो सकता

+भारत का पुरावृत्त देशा ओर विदेशके विद्वानों की गवेषणा का प्रधान विपय रहा है अव तक इस पर पर्याप्त प्रकाश पड़ भी चुका दहै उस कार के जीवन पर निम्नलिखित कतिपय खोज-पूणं अध्ययन उपयोगी हैँ

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उपक्त आधारं से निष्कषं यदी निकर्ता है कि उस कार भे दासः शब्दं

के नाम के साथ नामांरके रूपसं जोडने की प्रथा नदीं सी थी 'सदुक्तिकर्णामतम्‌'

के रचयिता श्रीधर दास तथा उनके पिता बडु दासका उल्छेव दहै चिन्तुरेसे स्थरो पर दासः नामांश नहीं भरन्‌ वगं या जाति का दोनक दै

( ) अले दही कालिदास करे जत्म का नामः, जन्मस्यान कानाम या उनके छुर-शीट का पता दो, किन्तु किवदन्तियो कदी गहं उनकी देधी "कारी की साधना ओौर उनके द्वारा विरचित विपु कान्य-फशि मर च्भाचित पारस्परिक समन्थय का गुप्र रदस्य, हमे अवश्य रूपे सृष्टि आदि स्तर्‌ चिरल्नन क्रम मरे निहित शान्त नियम का संकेत देनाडहै। क्काछीः का उपयुक्त विवैथन सिद्धं कर्‌ चुका दै कि शष्ट करी समग्र तास्व परम-रमणीयता' का केन्द्रीभूत प्रतीक दही (काढी ह| रमास्मकता उसी अनिवायं चेननादै। इस नाते कारी की साधना, उसकी उपरि ओर्‌ उसकी सागोपाग प्रतिष्ठा रस के माध्यम त्त दी स॑व दौ सकती हे। कालिदास भी रससिद्धं कचि थे "कलाः करे विवेचन से स्पष्ररै कि समस्त खजनरीखता उसी^रसः की आश्रयिणी टर सौन्दर्य-शाखः क्या प्राचीन ओर क्या नवीन सी, एक खर से सकार करता करि मन्तुखन अर्‌ अनुपात्तिक नियोजन का समन्वय टी सोौन्द्ये का प्राण है, यत कटा की सावना सौन्दय॑-साधना हे जा अपन विधानमे रसाध्रितटै) कवि कटार दोने के नातेदी “काः ओर्‌ उमसे सम्बद्ध समस्तं योजना का (संयमी सावः है इसी धिच वह “काटी! के व्यक्त रूप्‌ "मणी! का उपासकः दे

ऋण्वेद से ठेकर विविध उपतनिपद, पुराण; प्रचीन ओर अर्वाचीन व्य तथा उपाख्यान देवी (सरखतीः की अ्चैना करते नदीं थक्ते, उन जाद्दान-मतर एवं उनकी स्तुति गाये गये सोत्र सभी एक स्वर से उन्द्‌ परम वाच्छनीय ्ान की अधिष्टात्री के रूप मे पृजते चङे आये द। लान प्रका्तमयदहे। ज्रानक्ी अविष्ठात्री की कल्पना क्या साकार आर क्या निराकार सर्वत्र ही भाखर, प्रकाशमय स्वीछरत है दसीके आधार पर्‌ वरे ष्पः गुणः वेश्तमूषा वलादि मे भी चुर अौर धवरतत्रियाः मानी गहं प्रकरा तान च्छा प्रतीक दै, इसी के चिपरी अल्यमार्‌ त्रान ओर्‌ अलति का। प्रकारा निर्भयता क्रा दाताहै, अन्वक्रार्‌ भयन्ाजनकदटे। प्रकाशा काज ही है अभिन्यवित) अश्रि अभिव्यपिति के माध्यम सं दही प्रकाशन दत्ता दै।

( ) “कठः अपनी श्थिलि मं विशद (लान्ति छ्येने के बाति देवल शयनीय रहै, किन्त खाधनेषूणे होने पर उसी देवर श्फयनीय है, जन्तु हरणं देने पर उसी

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ताच्तिक सिद्धि की यैख्थिक अधिव्यत्ति अदनी हज रसजयतः को लिय सरखती के खूयं मँ व्यक्त होकर

उकाद्धित दती है! यदी सिद्धि दै कवि थौर कराकर की। गोचर ओर अगोचर विश्व मूढ मे उपख्ित चिरन्तन सिद्धान्तो की प्रयश्च प्रतीति के चयि द्धी सानो कालिदास हसे काटी क्रा प्रसाद्‌ ओर "वाणीः का वरदान साकार हता देख पडता दै कोाठ्य-रसिक-जन युगो से कहते चके आये कि “उपमाकालि- दासस्यः अर्थात जह तक नवीनतम ओर मार्मिक उपसाओं का प्रश्न दै काङिदास अग्रतिम ह! इसमे सी रघुवंश मं इन्दुमति के खवय॑वर स्थर पर दी गई दीप-शिखा की उनकी उपमा बेजोड मानी जाती है अनेक खलो पर कालिदास का उल्छेख "्दीपशिखा-कविः के नाम से - भी मिता है ठेकिन जरा सोचना पडेगा कि काछिदास की कविता का अमरत्व क्या केव उनकी उपमाओं के आधार पर ही टिकादै! ओर यदि उनकी अतुपम उपमाओफर वेचिच्य की सत्ताको भी खीकार कर छिया जाए, तव भी विचार करना ही पड़ेगा कि उनमे एेसी कोनस्यी शचित्त थी जो उनकी उपमां को इतनी ख्याति प्रदान करवा सकी उच्चकोटि आलोचक उनके उक्ति चातुयं पर भी कम मुग्ध नदीं दै, अर्थात '्व्य॑ग्यः जो काव्य-रीति का मुख्य आधार है, उस पर सी काड्दिस का एकत्र अधिकार था। काव्य के इन मूर तत्वों का विश्छेपण आज तक अगणित आचार्यों की पेनी बुद्धि की गवेषणा का विषय रहा है ओौर निष्कपं खरूप जो तथ्य निर्धारित दै वह्‌ कुं इस प्रकार दै कि कविता केवर विचार नहीं, केवट उक्ति चातुर्यं नही, केवरु शब्द-सौल्दयं ही नीं वरन्‌ इन तीनों का संयुक्त रसमय निर्वाह है जे सिद्ध कथि के द्मारा उसकी सजीव कस्पना-शप्ति के सहारे सम्पन्न होता दै मास्तीय वाङ्गपय सेः विशेष कर काव्य-शाखमें

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कल्पना का महत्व चिरोष दै इसे कराकार की शपति कहा गया दै कल्पना केवर मानसिक उड़ान नही, कल्प शब्द का कोषगत अर्थं दै (छजनः। कल्पना वह है जो सृष्ट्मतम्‌ मावो को, विचारो को शूप प्रदान कर सके र्यग्य' शब्द की वह अदूभुत्‌ शक्ति है जो उन्दी गूढ एवं सृकष्म विचारो ओर भावों के कल्पितः रूपों को रससिक्त शब्दो के माध्यम से प्रयक्र करदे। उसी आधार पर "कल्पना" को “अकार जननी' भी माना गया है कट्पना के ही द्वारा कचि प्रस्तुत ओर अप्रस्तुत मे सामञ्चस्य स्थिर करता दै ओर विविध अर्छकारो की योजना उपस्ित हो जती है सजीव कल्पना के वरु पर दी कचि सुषम भावों ओर विचारों का दशनः करता है ओौर उसकी रसवती वाणी शब्दगत प्रदर्शनः मे उसको सहायक वनती दै। कथि की सृष्मदरिता की परीक्षा का यही सट दै। अतिसाधारण अनुभव या विचार भी सफल कवि के हाथो पड कर असाधारण वन जाता दै |

कुमार सम्भवः मे पार्वती का वर्णन करते हुए कवि कहता है :--

मध्येन सा वेदि विग्न सध्या वलित्रयं चार वभार वाला | आरोहणार्थं नवं यौवनेन कामस्य सोपानमिव प्रयुक्ततम्‌

किसी सुन्दरी के अंग-उपाग को शोभा की ओर अकृष्ट होना सद्दय मानव का सहज व्यापार है। उसे निरखना तथा उसकी सराहना करना भी कुदं वेसा ही व्यापार दै, चिन्तु उन सौन्द्य लों मे सार्थकता के साथ प्रकृति का निमित्त उसी की वाणी मे समभना ओर उपे "रसिको को भी सममा देना कचि काही काम है “त्रिवलिः को यौवन आरोहण के साथ काम का सोपान कहना एक सार्थक उक्ति हे,

कवि या कलाकार खभाव से केव सौन्दयान्वेपी दी नदीं होता, सोन्दुर्यापासक भी दोता दे कालिदास का तो कहना ही क्या उनकी

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विवध कृतियौ का एक-एक शब्द सौन्दर्य की आराधना का मंत्रोच्ार सा करता सुन पड़ता है; केकिन सौन्दर्य असीम है; यह सस्य जितना अधिक काछिदास की छृतियोँ से सिद्ध होता दै उतना शायद अन्यत्र नदीं यदि नर ओर नारी का सौन्दयं उन्दने देखा तो प्ट, पक्षी, घासः पूर, वन ओौर तडागः, सरिता ओर सागर, पवत ओर आकाश का सौन्द्यं मी उनकी आंखों के सामने प्रतिक्षण भूकता देख पड़ता दै! उनकी पेनी ठेखनी ने गिन-गिन कर विश्च की विभोहक दुनि को आंककरख्िरकरदेनेकीसीचष्ाकीदहै। यक्ष की अङ्कापुरी मले ही अगज हमारी-ंखो सामने से ओभछ हो गई हो लेकिन (मेघदूतः के पन्नो मे वह्‌ युगो तक सुरित रहेगी कण्व का आश्रम अज अपना असित्व खो चुका है ठेकिन वही के सृग-दौने ओौर वहां का पुनीत शान्त वातावरण “अभिज्ञान शाकरन्तछः की पंक्तियो अमिट दहै! सौन्दयं का यह्‌ पारखी उपासक मार संभवः ओर न्तु संहारः मे वर्णित उन्युक्त शगार के मिस दीवानेपन की ख्याति भी ्राघ्र कर चुका दै किन्तु आश्चयं तो तब होता दै कि सुन्दरता का यह चित्रकार अगणित चित्र अंकित करता हु भी कहीं किसी नारी के नखशिख का आद्यन्त वणन शायद्‌ नदीं करता काकिदास की नारी-खष्टि एक यक्षिणी को छोड कर शायद्‌ सभी इतिहास प्रसिद्ध रमणिर्यो को केकर की गई ।! परम रूपवती खिथां ही दै--उवेशी इन्द्र अखादेकी अप्सराओं की नायिका दै, @सार-संभवः' नगाधिराज की कल्या पार्मती साक्षात सौन्दर्य की मूरति है, शङ्न्तखा बेद-उ्यास प्रणीत.महाभारत की सुकुमारः सदजह्दया परम सराः रवण्यवबती ऋषि कन्या है! रेसे रम्य प्रतीको को पाकर भी चिररूपावप्त कवि क्राछिदास की तुका उनके रूष-विकास की मादकता मे उक कर निरन्तर उनके मानसिक ौर तरस्पशी हदय सौन्द्य के मर्म चित्रण में ही तहीन देख पडती है! यद समस्या आरोचक वगं च्ियि एक अनवूः पदेी चन जाये शायद्‌ इसी ल्यि कवि-कख-गुरू

ते खयं हो सवंशं जौ९ षार संभव सें एक पसम सिद्ध दाशनिक

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दी भांति जीवन कं शाश्वत रहस्य की ओर संकेत करते हुए कहा हे कि “महाकाल के राजपथ पर सतत्‌ गतिमान जीवन रथ के दौ पिये जो ख. -वह्‌ हः किन्तु इनकी गति एक दूसरे के विपरीत दै बढता हुमा शरीर जवः क्रमशः क्षीणताजगासी होता दै, मन का पिया निरन्तर अभिनव प्रौदृता ओर पुषता प्राप करता दै ।* अर्थात शारीरिक सौन्दर्यं क्षणिक दै, किन्तु मानसिक सौन्दयं अपेश्षाकृत अधिक सखायी ओौर एपणीय है कविकी इसी दृष्टिने उसे अन्तरोत्युख चना दिया, ओर द्रस्यी फे कारण शायद उसकी विविध उक्तियों मेँ सल का वह खर गूज उठा कि जो उसे जज तकं देश अर काट की सीमां मे वोँध सका काठिदास भारतके थे ठेकिन भोतिकवाद्‌ का उपासक पाश्चादय का अचर भी उनका कम अनुरागी नदीं जर्मनी का अति प्रसिद्ध कवि “गर्दा अपने "फाडस्ट' की भूमिका मे काठिदास की वन्दना जिन शब्दों मे करता है वे एक उदात्त मानव हृदय के सरल उद्गार है केवर अज का दी नहीं १६ वीं शताब्दी का रूस भी कालिदास पर विमुग्ध हे “मेघदूतः के संसार की विवध भाषाओं मे अनुवाद सिद्धकरदेते है किं उनकी वाणी की प्रतिध्वनि चिश्च व्यापिनी थी उसक्रा रहस्य है काषिदास का सौन्द्रयं के माध्यम से सत्यान्वेपण सल अपे रूध ओर धमं मे यदि अपरिवतन-शीट माना गया हे तो सावैदेशिकता ओर सा्वभौमता उका रक्षण है कलात्मक सादिट के दे्त-देशान्तरों मे विविध स्वीछ्रत रूप वर्गी- करत दँ दो प्रकासें म--नाटक ओर कान्य ! अर्थात द्श्य-कान्य अतर शर्य काव्य यह मी काङ्दिसकी असाधारण प्रतिमा का दी प्रमाण है करि उन्टोन दोनो रूपा मरे का्य की साधना समान भावसे हीकी। नाटक फेष्षत्र भे उनके नाटक जहा सर्वश्रेष्ठ माने जाते है वहीं महाकाव्य के क्त्र उनका ^रथु्॑शः ओर रमार संभवः छासाना है यद्‌ सव कुं छिख चुकने के वाद्‌ मी उन्दने भेष-दूत' के रूप मं एक खण्डकाठ्य प्रह्तुन जिर, जो अयने कञप्िरम खु होता हुभा कातपरश्रां क) चद्म-तीमाकाप्रतोकमाना जाना दे। किती कृतिं

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( ) अथवा किसी व्यक्ति की महानेता का एक सिद्ध प्रमाण यहभी हैक उसका अनायास प्रभाव किंस परिमाण में पड़ा मेघ-दूत के अतुकरण पर सेकडों दूत-काव्यों का चछ्खिा जाना खतः उसफी श्रेष्ठता का परमाण है। दूत-काव्य का छलि जाना, जहा तकं सूचना प्राप्त हैः भारतीय कान्य-जगत की प्राचीन परिपाटी है। इसके बध मे खयं कविश्रेष्ठ कालिदास की दयी सीदति प्राप दै कि मेघदूतः के लिखने में उनकी प्रेरणा का सतो था बाल्मीकि रामायण का वहं प्रसंग जिसमें पवन-घुत हनूमान का प्रसिद्ध दौलय कमे वणित दै अव सहसा प्रश्न उठना स्वामाविक दै किं मेघदूत की रचना काछिदासमे केष दूत्त-काज्यः छिखने की परम्परा के निर्वाह निमित्त की या इसका कुठ ओर प्रयोजन था ? यदि दृत-कान्य परस्परा का निर्वह्‌ ही कवि-का निमित्त होता तो संभवतः कवि को एेसे अनेक खल "रघुवंशः ओर मार संभवः मं ही प्राप्न हो जाते किन्तु उनमें इसका निर्वाह कटी नही किया गया; तब निश्चय ही इसकी रचना का प्रयोजन कु ओर होना चादिये मैघ-दूत में स्थर-खर पर कवि की रसात्मक उक्त्या ङु इतनी हृदेय स्परिणी दै, उनमें खसंवेद्यता का पुट कुं इतना उभर आया दहै, कि जिसे देख कर अनेक आगखोचक निष्कपं निकारते हैँ कि भेघ-दूतः में कविं के अपने जीवन की घटना का प्रतिबिम्ब देख पडता दै किन्तु फैवर उपर्युक्त आधार पर इस रचना को आत्मचरित्र मान वेखना श्रामक चिचार है! काव्य की रसादमकता सिद्ध दी तव होती दै जवं छवि स्वसंवेदन-शीख होता हे! यदि इसमें श्रुटि हो जाएं ओौर कवि पेरसंवेदनशीखोन्युंख होकर स्स की छट करने चै तो उसे सफक्ता शायदं दी भि! इसख्ियि केवर मेघदूतः की अति रसात्मकता अाधारं परः उसमे कालिदास के जीवन की मंकी देखते की वेष्टा धहुत साथेक नहीं मानी सकती लेकिन इसी के साथं एक अन्य आवश्यक प्रश्न भी उठ खडा होता है कि विरह निवेदन के निभित्त मेघ का आश्रय ही कवि फे द्वारा क्यों चुना गया यहु तो लीक हे कि संसारके कौव्यमें रसराजं गार

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की सर्वोच्छृष्ट निष्पत्ति वियोगावस्था के चित्रणमे जितनी निखरी उतनी सयोग मे नटी, यद्‌ भी ठीक दे कि वियोगावस्था को उभादने मेँ पावस-ऋतुकी स्याति सवै-खीछृत हेः विन्तु वसन्तागम अथवा शिशिर ससे पीछे नदीं, खयं कालिदास ने अपने श्तु-खंहारः तथा अपनी अन्य कृतियों मे भी स्यख-स्यल पर इस सय को स्पष्ट शब्दों मे खीकार्‌ किया है

सछंटि-सौन्दयं को अधिष्टात्री महाकाली का वरद्‌-पुत्र, कविता कामिनी का अचर सुहाग कालिदास जसा परम रस-सिद्ध कवि जो अपनी अनस्त काञ्य-राशि मे एक मी निरस्थक अथवा व्यथं अक्षर लिखने का दौपी नदी, वह्‌ भसेध-दूत' जेखी अपनी जगत-प्रसिद्ध सचना निष्पयोजन अथवा असुविनिश्धित निमित्त के क्षणिक आवेश मे कर ठे, यद संभव नदीं उनक्री कृतियों का निश्चित क्रम तो स्थिर नर्हीः किन्तु प्रटृप्रौद्‌ विवेक के आधार पर प्रायः स्थिर-सा हेः कि भेध-दूतः उनकी प्रौदतम छृति यद्‌ निष्कपं भी भेष-दूतः के छि जाने के प्रयोजन पर्‌ प्रकाश डालने कु सहायक सिद्ध दो सकता दे मेघः शब्द्‌ देव-वाणीका अति प्राचीन ओर प्रतिष्ठित शब्द्‌ हे। उसका उल्टेख ऋग्वेद के सवं प्रधान देवता इन्द्रके सहचरके रूप मे सवीक्रृत दे इसका मू अर्थं हे 'वेण-करने-वादाः ! मेव जिस तरख पदाथ का वर्षण करता है वह अनेकार्थ अग्रत कहा गया है अपने भेध-दृतःमे दी कवि मेघ को सम्बोधित करते हूए वारम्वार अति आगद्रसूचक शब्दौ का उसके दिये प्रयोग करता दै केवल भभेघ-दूतः मे दी नदीं "रघुवंशः मी एक स्थल पर कवि कटता हं कि सं परथ्वी का जर शोषित कर छेता है किन्तु सागर के खारे जट को भी अग्रत-तुख्य मधुर वना कर मेव के द्वारा प्रध्वी को ही फिर दे डाछता है। अर्थात निष्कषं स्पष्ट है करि मेव प्रकृति मे व्याघ्र मधुर रस का प्रधान वित्तरकदै--जीवन-द्‌ाता हे कदाचित्‌ यह मेष की सहज रसमयता का दी प्रभाव है कि उसके दशन मान्न से मानव ही क्यों प्राणीमाच्र का हृदय सरसित हो उठता हं मेघकी इस रममयताकी एक अनूटी छाश्रणिक प्रशस्ति दर्शनीय है-

( ) "प्रायः स्वौ भवति कर £ त्िराद्रान्तरात्मा” | केवर इतना ही नहीं जीवन कै असीम मूल्य को अकता हुआ कबि बहुत अगे बढ जाता है, जब वह कहता दै- स्तेहानाहुः किमपि विरहे ध्वं सिनस्तेस्वभोगात्‌ ष्टे वस्तुन्युपचितरसाः प्रेम राशी भवन्ति इन कतिपयं उक्तियोमे काङिदास की चरमरस-सांधनाकी सूचनां भिक्ती है। स्पष्ट है किं उसने रस की सत्ता केवङ कान्य ओर्‌ करा के क्षेत्र मे ही नहीं देखी, वरन्‌ व्यष्टि ओर समष्िके जीवनमें यह किस सीमा तक ब्याप्न है, इसका अनुभव कवि मे आजीवन किया है रस का प्रतीक मेघ है, उसीके मिस कवि रस की आराधना करता हजौ अपने इस प्रौदृतम काव्य मे अंतिम घोषणा-सी करता है कि रसद सार है-कौकिकः अङौकिक अर पाररौकिक जीवन के तन्तु मी केवर इसीसे सिचित दै! यदी रहस्य हे मेघदूतः की रचना का ओर काछिदास की रस-सिद्धता का

--रुकिता प्रसाद्‌ सुक

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देवीप्रसाद प्पृणंः

महावीर प्रसाद्‌ द्विवेदी

सेट कन्दर्ाटाट पोद्यार

कालिदास का जीवन चरित्र ( भारतेन्दु बा० हरिश्चन्द्र )

पश्चिम प्रदेशीय पण्डित छोग भारतवर्षीय कवियों मँ कालिदास को सर्वो- ष्वासन देते है! बम्बई के प्रसिद्ध पंडित माउ्द्‌ाजी ने केवल कालिदास कीः कषिता दी नदीं पटी वरन्‌ बहुत परिश्रम करके प्राचीन संस्कृत प्रन्थ ओौर ताम्रपन्नोः से उनका जीवन वृत्तान्त मी संग्रह किया! हमने भी उनके मम्थ से कई एकः बतं रहण की हैँ।

कालिदास चिख्यात महाराजा विक्रम के नवरतनों मँ ये इसके *#* अत्ति- रिक्त उनके जीवन की गौर कोर प्रामाणिक बात लोग नदीं जानते बवगदेश ङेः कटे अभिमानी पंडितो ने काछ्िद्सि को रपट ठहरा कर उनके नाम से हास्यरस की कवितां का प्रचार किया पाठशाला के युवा ब्राह्मण थोडा सा मुग्धबोध व्याकरण पढ के इन र्छोकों का अभ्यास करके धनिक लोगों का मनोरंजन करते है गौर इसी प्रकार धनी रोगों से प्रति वषे ङं पातेः यथार्थमेंतो यद्‌ सव कविता फालिदास की नदीं है, परन्तु नवीन कवियों की बनाई हुई है 1 “प्रफुल्ित ज्ञान नेच नामक प्यमय पुस्तक बंगभाषा में मुद्रित हुई है! इस ग्रन्थ मे छोर्गो ने मिथ्या कत्यना करके कालिदास मेँ उपर छिखि हुया दोष ठदराया है दसी प्रकार सै इन दिनों अंगरेजी भूमिका सित एक रघुवंश की सटीक पोथी मुद्रित हर है! इसमे मी रोगों ने सिध्या कत्पना क्ियारहै। कालिदासनः किसी भी भ्रन्थ मँ अपना वृत्तान्त कुक मी नदो लिखा है, केव इतना दी प्रकट कियाहै। ` संजा रुस्मण सिंह रघुवेरा ये, उत्था मे यो छिखते है कालिदास क्िखते कालिदास नार केक क्मिहुएद। उन्मदो मुख्य गिने जते ्है--एक वह जो राजा बीर विक्रमाजीत की समा कं नौर्लनों मँ था, दृसरा जो राजा भोज के समय में हुमा इनमे मो पण्डित लोग पठे को दूसरे से श्रेष्ठ मानते दँ गौर उसी के रचे हए. रघुं, कुमारसम्भव, मेषदूत, ग््तुसंहार इत्यादि कान्य गौर शाकूुतल नारक विक्रमोवैसो जोट जर ओर अच्छे अच्छे मन्थ समक्षे गये हे

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धन्वन्तरि-श्षपणकामरसिद्तंककु-वेतालमदरवटखपरकालिदासाः। ख्यातावराहमिदिरोदधपतेःसभायारत्नानिवेवररुचिमैव विक्रमस्य

केवर इतना दी परिचय नवरत्न का लिखि है) असिन्ञानश्ञाकुन्तल-प्रन्थ- कता के इतने ही परिचय से सवृष्ट रह सके ओौर-ओौर संस्कत भ्रन्थो से इस विषय का अनुसधान करना उत्त है ! प्रायः ५०० वपे हुए कि कोलाचल मह्धिनाय सूरिने काल्दास कृत काव्यो की टीकाकीहे) उन्द्येने यह टीका दक्षिणाषर- -नाय की टीका टेख कर बनाई परन्तु बह अव दुष्प्राप्यं है। माषातलवित्‌ कातेन साहव ने य॒द्‌ लिखा है कि कालिदास ईसवी दौ संवत्‌ समुद्रगुस की समा मे वतेमानथे। छसेनने एक पत्थर टेखा था, जिस पर यह ल्खिाथाकि “समुद गुप्त कवि वबु कान्य प्रियः ओर इसी से वह॒ अनुमान करते कि कविश्रष्ठ काछिद्‌ास ठनक्रे सभासद्‌ ये) वेण्टली नै एञ्षियारिक नामकं पचिकामें मोज श्व का फरासीसी अनुवाद ओौर '्याईने कबरी" को वेख कर ल्लादहैकि मोज राजा के राज्यकरे ८०० वर्प पद्चात्‌ विक्रमादित्य की समा मे कालिदास वर्त- मान ये, परन्तु यह वाते क्टापि नद्रीहो सक्ती। वैरी ने ख्ीय अरन्यं मे कदं एकं एेमी युद्ध वातं छिखी हँ जिनके पटने से बोध होता है कि वह इन्दं का इनिहास कुदं मी नदीं जानते

कर्नेल विरुफोड, प्रितेप यौर एल्फिनस्टन ने लिखा हे कि कालिद्‌स प्रायः १८०० वपे प्रवे वतमान ये

भोज प्रव्रध के प्रमाणानुत्तार गुजरात, साल्व आर दक्षिण के पठन कदते कि काद््दिास सन ११०० ईस्वी मोल राजा के समासद्‌ ये उज्जैन कै राज- सिद्वामन पर्‌ सदै विकमादिव्य जौर मोजराज नामक राजा वैटे, परतु सवसे अतके गोजराजा नौ मवत्‌ ११०० दवी राज्य करते ये यौर इससे वोध होता है कि नङ विक्रम द्री को भोजराज कहते जीर उन्ही कौ नवरन्न कौ सभा थी. हमने स्वयं "भोनप्रन्धर' पाठ कर केदेखा टे कि उसमे यह छ्खा है कि मारव देशात- सत ध्रारानगसभिप भोज यिन्वल फे पुत्र जीर मुनके घ्रातूषु्रये। मोनकी वाव्यायम्धाम पना खा परलोक हुभा उनके पिच्रज्य मुज राजपद्‌ पर्‌ मिपि दुष्‌ सार मोन ने उनवे मन्त्री वन क्र वहत विद्या उपार्जन किया ओर्‌

डमी धरार नोन दिन प्रतिदिन विग्यान दोने खे। तामुजफेमन

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संका दुरे करि अब छोग दमक पद्च्युत करगे यौर यह त्रिचार करने ल्गे कि किसी- प्रकार से भोज का प्राणना करू इसी हेतु सुज ने वत्सराज राजा को बुरा कर अपना दुष्ट विचार प्रकादित किया भौर कदा कि भोजको शीघ्रही मरण्य में - ठे जाकर इसका प्रणनाद करो परन्तु इस राजानेमोजकोतो क्िपा रक्खा ओर पञ्च॒ के रक्तसे भरे हुए खड्ग को राजा मुज के पास मेज दिया। इसको देख कर उन्होने सानन्द्‌ चित्त से पृक्ठा कि मोजने मारव लखा समाप्त किया यह सुन वत्सराज ने एक पत्र पर किख दिया कि--मान्धाता, जो मोज क्या, एक समय चप कुर का शिरोमणि था यब परलोक में है रावणारि रामचन्द्र जिन्होने समुद्रम सेतु नांधाथा वह कदां है ओौर बहत से महोदय गण ओौर राजा . युधिष्ठिर ने खगरिोदण किया हे, परन्तु प्रभ्वी उनके साथ नहीं गयी पर आप के साथ प्रथ्वी अवद्य रसातलको जायगी ¢ इस पत्रके पठतेदीमुजका शरीर रोमाश्वित हा ओर मोन के ल्यि अत्यन्त व्याकुल हुए परन्तु जब उन्द्येने खना कि भोज जीता है, तो उनको वत्सराज से शीघ्र बुकुवा कर वारानगर के राजसिंहासन पर वैठाया भौर आप ईश्वराराधनके निमित्त अरण्ये प्रवेश किया मोज ने पितर सिहास्न पाके बहुत से पण्डितां को अपनी समामे बुराया। हमको मोज प्रबन्ध मँ कालिदास के सदित नीचे च्खि हुये पण्डितो केनाम भि :-- कर्पुर, कलग, कामदेव, को किर, श्रीद्च न्द्र 2) गोपाच्देव, जयदेव, तारेचन्् दामोदर, सोमनाथ; धनपा, बाण, भवभूति, भाष्कर, मयूर, मद्िनाथः, महेरवरः माघ, मुचङुन्द्‌, राम चन्दः रामेदवरः भक्त हरिवंश, विद्याविनोद्‌, विङ्ववसु, विष्णु- कवि, राकर, सामठेव, छक; सीता, सोम, सुवंधु इत्यादि 1 सीता अवदय किसीलखीकानामदै गौर इसीसे बोधदहदोतादहै कि लखी रिक्षा उस समय प्रचलितिथी। तो हम नदीं समक्तेकि हम रोगो के खटेरीय अब इसको क्यो दुरा समम के अपने देशा की उन्नति नदीं होने ठेते ठेखिये, अमेरिका मे स्त्री दिक्षा कैसी प्रचक्ति है भौर जो छोग एक समय अलयन्त मूखं अवस्था मे ये जव यूरोप के रोगों को भी दवा लिया चाहते हः तो यद टेख कर हे दिन्दुस्तानियो ! क्या तुमको थोडी भी कजा नदीं याती पण्डित रोषगिरि शास्त्री ने छिखा हे कि चह्टालसेन ने १२० ईस्वी मेँ भमोज-

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वन्ध बनाया इसते बोध दोता है कि उन्दने मोजराजके विद्योता गौर उनके सम्मान की ब्रद्धि हेतु कालिदास, मवमूति इत्यादि कवि्यो को केवर अनुमान ही से मोजराज का समासद्‌ ठहराया है मोजचरितर मँ इन सव कविर्यो के नाम मिर्ते इसस्यि भोजप्रवन्ध को कैसे प्रामाणिक गून्थ कँ इसी मोजराज के पू रामायण, सरसी कंठाभरण, अमरटीका, राजवा्तिक, पातंजलिरीका यौर्‌ ्वारुचार्यं इत्यादि वहुत से गृन्थ मिरुते है, परन्तु कार्दिस, भवभूति सादि कषियो के नाम इनमे से एक भी ग्रन्थर्म नदीं च्वि ह! विश्वगुणादूर्धाक प्रन्थ- कार वेदाताचार्यं कालिदास श्री दष यौर सवभूति एक समय भोजराजके समामे पत्तंमान ये, जैसा छिखा मी हे मावश््वौरो मयूरो सुररिपुरपरो भारविः सारविद्यः। श्री हर्पःकालिदासः कविरथ भवभूलयादयो भोजराजः इसमे वे मी मोजप्रवन्धप्रणेता वल्लाल के न्याय महाघ्रम पतित हुए ई, दर्योकि श्री दर्प, कालिदास सौर भवभूति एक काल वतमान नदीये! इस विपय में वहुन से प्रमाण मी हैँ भारतवर्षं के बहुत से राजाभोकानाम धिक्रमादित्य था। उजयिनीके अधीदवर विक्रमादित्य जो ५७ ° पू० मं राज्य करते ये गौर जिन्दोनि संवत्‌ स्थापन कियादहैतो अवहम लोगो को देखना वचादिये कि कालिदास इस विक्रम कीर्मार्मे उपस्थिनियेवा नदहीं। दम्बोल्ट लिखते हैँ कि कविवर ष्ोरेख सौर वजिर काकिद्ास के समकाटीनये। इस बात को बहुत से यूरोपीय पण्डिनों ने स्वीकार कियाहै। कनैर यड ने भपने राजस्थान के इतिहास भें लिखा दे कि "जब तक हिन्दुः साहित्य वतेमान रहेगा तन तक छोग मोजा श्रमार अर उनके नवरनो को भूरेगे ! परन्तु यह॒ठदराना बहुत कठिन है कि षद गुण-पडिन तीन मोजराजो मसे किस मोलराज की नवरन ङी समा थी कर्नल रोद ने यह निरूपण किया दै--प्रयम मोजराज सवत्‌ ६३१ मे, द्ितीय ७२१

रम #र तनीय मोजराज संवत्‌ ११०० ओँ षर्तमान ये ! “सिहासनगत्तीसी, बैताल

पमी सर "विक्रमचरित्र" जादि प्रथो मदाराज विक्रमादित्य की बहुतसी सनाोक्कि ण्यामरी हदे ६, इमी कारण श्नमे कोड सत्य इतिहास नर्ही मिट

म्ना 1 मस्तम कत श्परमन्ध " भौर राजदोखरङृत नुग चिनामणि' भौर राजद (चचतुविगति प्रधः

1...

मे च्खि दहे कि महाराजा चिक्रमादित्य अति श्रू वीर ओर महावर पराक्रांत पति थे परन्तु उंनमे नवरल ओर काछ्द्स आदि कवियो का कुछ भी वृत्तांतं नदीं छिखा है -

जेन ग्रन्थों मे छिखा है फि सिद्धसेन नामक जैन पुरोहित विक्रमादित्य के उपदेष्टा ये) परन्तु हम नदीं कद सकते ये किं यह॒ वात कहां तक शुद्ध है ओर एक जैन ङेखक कहते हैँ कि ७२३ संवत्‌ मे भोजराज के राज्य मँ बहुत से लोग उज्जयिनी नगर मे जा बसे ये! यद भौर बृद्ध भोज दोनो जेन मतावरूम्बी ये यद सव तात जेन अन्धो से ज्ञात होते हँ भौर भौर संसृत न्धो मै ये सव प्रमाण नदीं भिर्ते वद्धभोज मनान्तुञ्च सूरि के रिष्य ये मनान्तुज्ग ओर बाण मयूर मट्‌ के समकारुकि जेनाचाघ्य ये बाणङृत हषेचरित पटने से ज्ञात होता है कि उन्होने सन्‌ ७०० ईखी में श्रीकंटाधिपतति हर्षबद्धन के साथ सैट किया था यदी कान्यदुन्जाधिपत्ति हषवद्धन शिकछादित्य ये मौर इन्दी की सभा हि्यांग सियांग नामक चैनिक परिव्राजक बुलाए गएये। वाणकविने दियांगसियांग के भ्न्थ को पाठ करके अपना गन्थ बनाया दर्षैवद्धन के साथ चै निकाचाय्यं की भेट का वृत्तांत हषं चरित मँ यवन प्रोक्त पुराणः नामक ग्रन्थ से छ्य गया दहे,

महषि कण्व ने अपने कथा “सरित्सागर' के १८ अध्याय में नरबाहन द॑त्त को विक्रमादित्य का उपन्यास कहा है! उसमे लिखि करि चिक्रमादित्य सन्‌ ५०० श्वी मेँ राज्य करते ये। नरवादन दुत्त जेन मन्थ, सरित्सागर ओौर मत्स्यपुराण के मतानुसार शतानिक के पौत्रये) नासिक एक पत्थरकी वटान मिली है जिस पर विक्रमादिख का नाम लिखि है गौर उनको नामाग, नहुष, जन्मेजय, ययाति ओौर बलराम के नाई योद्धा वर्णेन किया है ! पाठकजनो फो देखना उचित है किएक विक्रमादित्य के इतिहास कितनी गउनड है! लोगों मजो केवर एक दी विक्रमादित्य प्रसिद्धै, इस समय के मारनवर्षीय इतिहासो करै एक विक्रमादित्यो के नाम भिरे ँ। परन्तु हमको उस विक्रमादित्य का इतिहास ज्ञात दोना अवद्यक है जिससे हम लोगो का सन्देह दूर हो ओर यह जान पड़े कि नचरलों के अमूल्यरन्न कवि-चक्रचृष़ामणि काणिदास का विक्रमादित्य से कुक सम्बन्ध है नहीं

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श्री देवकृत धिक्रमचरित मे छिखा है कि चिक्रमादिय तीर्थकर वद्धमान के नाम होने ४७० वर्षं परे उज्जयिनी में राज्य करते ये ओर इन्दनि दी संवत्‌ स्थापन च्वि है, परन्तु इस भ्रन्थ कालिदास का नाम मी नदीं लखि दहै। पण्डित तारानाथ तर्कवाचस्पति कदते कि महाकवि कालिदास ने रघुवंश, व्ुमारसम्भव" भौर भेघदृनः वनाने के अनन्तर ३०६८ ककिगताब्द् 'ज्योतिरवि- टाभरण' नामक कालन्नान चास्त्र वनाया। मेघदूत प्रकारक वावू प्राणनाथ पंटिन मदागय ने मी इस वात को यपनी भूमिका में खा दै, परन्तु यद किसी ग्रन्थक्रार की दष्ट मं नदीं पडा करि शज्योतिविदाभरणः रघुकार काकिदास रचित है तकरैवाचस्पति मदाशयके मन को सहायता देने के निमित्त 'उवोनिर्विदामरणः के कतिपय द्लोको का अजुबाद्‌ करके नीचे लिखते है, जैसा कालिदास ने छिखिा। मनि इस प्रफुदकर ग्रन्थ को मारतवर्षान्तरगत माच्च देश्य ( जिसमे १८० नगर ई) राजा विक्रमादित्य के राज्य के समयरचादै॥७॥ अकु, वररुचि, मणि, अंटरुठत्त, जिप्णु, त्रिलोचन दरि, धटखर्पर, अमर सिंह भौर ओौर वहत से कवियों ने उनकी समा को सुोमित किया थधा॥८॥ सत्य, वराहमिहिर, अतिसेन, श्रीवाद्रायणी, भनिध्वः कुमार र्सिद ओर कईं एक महाय ज्योत्तिपन्लास््र के अध्यापक ये ॥९॥ धर्न्वनरि, धषपणक्र, अमर निह, णकु, वेतालभट्ट, घरखर्पर, ऋाल्दास भौर वराहमिद्धिर गौर वररुचि ये सव महाद्राय विक्रम के नवरन्न ये १० धिक्रमकी समाम ८०० छोटे-छोटे राजा गौर उनकी मढासभाँ १६बाग्मी १० ज्योनिपी, वैय यौर १६ वेद्-पारग पण्डित उपस्थित रहते थे ११ कोटे फटते है करि यह कवि, मालवा के हं पिक्रमादित्य के समय, दज्ञरत ध्माफीद्धयवीं मदीर्मेथा। उम राजा की राजधानी उज्जन नगरी थी। इसी शरण कालिदास मी बहांराया। राजा चिक्रमकी समानौ रलम, खम्नमे एक खान्द्दखथा। कतेक छ्डकपन मं दमने कुछ भी नर्द पदा 1 स्मे यद अनमोरु चिद्याकाधन हाथ एगा। राजा क्रदानन्ट को टड्की विद्योत्तमा मी पंडिता

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` थी उसने यह प्रतिज्ञा की कि जो सुमे शप््राथं जीतेगा, उसी को व्याहंगी उस राजकुमारी के रूप, यौवन, विद्या की प्रशंसा सुन कर दृर्‌-द्र से पंडित आते थे पर स््राथं के समय उससे सब दार जातेथे। जव पंडितो ने देखा कि यद लडकी किसी तरद वश्ये नदीं भाती भओौरसवको दरादेतीहै,तोमनर्मे अदलन्न छज्जित होकर सबने पक्ता किया किं किसी ठन विद्योत्तमा का विवाह किसी पसे मूखं साथ करावें, लिसमँ वह॒ जन्म भर अपने घमंड पर पक्तताती रहे निदानवे लोग मूखंकी खोज मँ निकले! जाते-नाते देखा कि एक आदमी पेड के ऊपर जिस टदहनी के ऊपर बैठ है, उसी को जड से काट रहा है | पंडिनों ने उसे महामूखं सममः कर बडी आवमगतसे नीचे बुलाया ओर कहा कि चको हम तुम्हारा व्याह राजा की च्ड्कीसेकरा देवे! पर खवरदार राजाकी सभार्ममुदसेक्छमी बतनक्ो,लजो बात करनी ष्टो इशारौँ से कदियो। निदान जन बह राजा की समा मँ पहूचा, जितने पंडित वहां वैठे थे, सब ने उठ कर उसकी पूजा की, ऊँची जगह बैठने को दी ओर पिदोत्तमासे यों मिवे- दन क्या किये वृहस्पति के समान विद्वान हमारे गुरु भापके व्यादनेको आये है परन्तु इन्दोने तपके खयि मौन साधन क्ियाहे। जोङ्छं सापको शास्त्रार्थं करना हो, इशासें से कीजिये निदान उस राजकुमारी नै इस यय से, कि शश्वर एक है, एक उंगली उठादं। मूखं ने यदह सममकर किं धमकाने के लिय उंगली दिखाकर आख फोड देने का इशारा करती हे, अपनी दो उगलिया दिखलायीं पण्डितं नेउनदो उंगछियो के सते मयं निकाले कि उस राज- कुमारी फो होर माननी पडी ओौर विवाह भी उसी द्म दहो गया। रान के समय जब दोनो का एकात हुआ, किसी तरफ से एक ऊंट चित्छा उठा 1 राजकन्या ने पृक्का कि यदह क्या रोर हे, मूखं तो कोई भी शाब्द शद्ध नदी बोर सक्ता था, कह उखा उट चिल्कतादहे! भौर जव राजकुमारीने दुदरयाकर पातो, उद्र की जगद उस्र कदने ल्गा, पर दध उष्ट्रका उष्वारणनकर सका! तवतो वियोत्तमा को पडतो की दगरावाजी मालूम दुर ओर अपने धोखा खाने प्र पक्छताकर एूट-फूटकर रोने रगी 1 बह सूखं भी अपने मन मे वडा कूज्नित हा पषलि तौ चाहा कि जान दही दे डाटू पर सोच समकर घरसे निक्छ विदा उपाजन मे परिश्रम करने ल्मा यौर थोदेष्टी दिनोमेदचेसा पंडितो

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गया, जिसका नाम आज तक चला लाता है जव वद्‌ मू पंडित दौकर घर आया, तो जसा आनन्द ॒विव्योत्तमा के मन को दुभा छिखने के वाहर दै सच है, परिश्रम से सव कुं दो सकता हे

कालिदास समय घटखर्षर, बररुनि नादि ओर भी कवि थे कालिदास जे काव्य, नाटकादि अनक्र न्थ सस्छरन-भपा चिदे 1 इनकी कान्य-स्वना चुत -खादी, मधुर भौर विषयानुखारिणी दै अंगरेन रोग कालिदास को भपने शेक्स- -पियर के सद्य उपमा ठेते हँ! इसके समय भवभूति नामक एक कवि धा। कहते द्र कि उसकी विद्या कालिदास से अधिक थी। परन्तु कवित्वगक्ति काकलि- दासकीसीनथी। मवभूति काल््दिसरके श्रेष्ठत्व को मानताथा।

कालिदास सारस्वत व्राह्मण था 1 उसको आखेट यादि खे की वडी चाह -थी जर उसने अपने ग्रन्थ में इमक्रा वणेन च्या दै कि मनुष्य के रीर पर रेस चेलो से क्या-क्या उपक्रारी परिणाम होते

विक्रमादित्य ने उसको कदमीर का राजा वनाया ओर यद्व राज्य उसने चार न्वरस नौ महीने किया

कालिदाख उचज्जन मेँ रहता धा, परन्तु उसक्री जन्मभूमि कदमीर थी 1 देशात्तर डने परम्त्रीकेवियोगसे जो जो दुख उसने पाय, उनका वखान मेघदृत-काव्य ्मकिवाद्े। कालिदास वडा चतुर पुस्यथा। उसक्री चतुराई की वहुनसी कहानियां ओौर्‌ वे सव्र मनोरजक्र है, यथा उनमें से कई एकयेरहै।

(१) मोजराजाको कवित्व पर वडी प्रीतिथी। जो कोई नया कचि उसक्र पाम आना चौर कविनाचातुर्यं वनाना, तो उसको वहं अच्छा पारितोषिक देता, ओर चाहा तो अपनी समामेंमी रखता। इस प्रकार से यह कवि- मण्डन व्रहून वद गया! उसमक् क्विनतोषतैयैकिवे एफ वार कोड नया उक मृनन्मनि,तोयमे क्ण्टकर्‌ स्तेये) जव कोई मनुष्य राजाके पास

आकर नया टठ़क् सुनाना था, तो कहने लगते ये, करि यदतो मारा पदिटेद्ीसे लाना नार्‌ भौर तुरन्त पृदृ कर सुना चते ये। प्क दिने काच््दिमकेपास एक कविनै {आक्र कहा कर महाराज, 'आप

दि गए व्ल यं पद रत क् पाम यट योर्‌ शरद्ुधन दिखा देवं, तो सुकूपर आपफाचड

सपर ष्मा => या नाम्‌ङेद नया ट्लोक बनाकर "राजसमा सुनाई, तो उसका

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चूतनत्र मान होना कठिन है इसलिये कोर युक्ति बताद्ये

काक्द्स ने कहा कि तुम दछोक्त में ेसा कदो कि राजा से सुमको र्ना का दारचख्नाहै, ओौरणजो दुमे कहता सो यहां के पंडतोंकोमी मालूम होगा। इस पर यदि पंडित रोग करं कि यद इलोक पुराना है, तो तुमको रलो का हार भिर जायगा, नदीं नये इरोक का अच्छा पारितोषिक भिरेगा

उस कवि ने काछ्दिसकी बताई हुई युक्िको मानकर वैसा दी रलोक चनाया ओौर जब उसको राजसभा में पठा, तो कतिमंडर चुपचाप हो रहा भौर उस कवि को वहुत्त सा धन मिला

( ) एक समय काकिदास के पास एक मृद्‌ ब्राह्मण आया भौर कहने छ्गा कि कविराज मँ अत्ति दरिद्री हं ओौर सुभे ऊक गुण भी नदीं है, मुः पर आप कुद उपकार करे तौ सला होगा

कालिदास ने कटा, अच्छा हम एक दिन तुमको राजा कै पास ङे चलगे, अगे तुम्हारा परारन्ध 1 परन्तु रीति दहै कि जव राजा के दरशन निमित्त जाते हैः तो कु भट ले जाया करते है * इसल्थिर्मँ जोये सटिके चार दुक्डेदेता सोल चरो। ब्राह्मण धर रोटा जर उन सरटे के दुक्ञें को उसने {धौती में स्पेट रक्खा यह देख किसी ठग ने उसके विन जाने उन टुकडोँ को निकार ख्या ओौर उनके बदले छकडी के उतने ही टुकड़े बांध दिये

राजा के दर्ानोँं को चलने के समय ब्राह्मण ने सरटि के दुक को नदीं देखा। जव राजसभा मँ पर्चा तव यद कष्टकीभेँट राजाको यपेणकी। राजा उसको देखते दी बहुत॒कोधित हुमा 1 उस समय कालिदास पास दही था। उसने कदा, महाराज, इस ब्राह्मण ने अपनी द्‌ रिद्ररूपी छकडी आप्‌ के पास राकर क्ली है इसखियि उसको जाकर इस ब्राह्मण को भाप सुखी करें | यह चात कवि के मुख से खनते दी राजा बहुत प्रसन्न हुभा ओौर उस ब्राह्मण को बहुत धन दिया

( ) एक समय राजा मोज +काछिद्ास को साथ ठे वनश्रीड़ा के हेतु अरण्य फो गए, ओर धूमते घुमते थके मदे दो, एक नदी के किनारे जा वैठे। इस > राजा कन्या ज्योतिषी, वैद गुरू सुर सिदध

मरे दाथ इन पे गये, शेष कायं सव सिद्ध

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दो वार, तीमरेको तीन वार्‌ अौर्‌ चौधेको चार वार खनने से नया दलोक कय्न्यहोजनाथा। मो जव कोई परटेमी पण्डित राजाकी समामे नवीन आदाय क्रा शलोक वना के छाना तो वह राजा करे सम्मुख पट के नाता था उस समय राना अपने पण्ठितोसे पूता थाकरि वह इलोक नया हेवा पुराना। तव वह मनुष्य जिसको कि एक वार के खुननेसे कंठस्य होने का अभ्यास्रथा कटा कि यढ पुराने जाजय का इलाक है भौर पमी पढकेसुना देताथा। इनफ़े अनन्तर वह मनुष्य जिसको दौ वार स॒ननेसे कंठदो जाताथापद़के सुनाना ओौर्‌ इसी प्रकार वह मनुप्य जिसको तीन वार्‌ भौर बह मी जिसको चार चार्‌ सुननेसे करस्य होने का अभ्यास था, करमसे स्व राजाको कंठाग्र सुना देत इस कारण परटेनी विदधान अपने प्रयोजन से रदित दो जातेये भौर ष्म यान की चर्चादेग देगातरर्म फटी) सो एक विद्वान एेसा देदाकालमे चतुर आर्‌ बुद्धिमान धा किं उसके वनाये हुए आय को इन चार मनुप्योकोभमी धंगीकार करना.पडा कि यद नवीन आय है यौर्‌ बह दोक यदी है शोक राजन्‌ श्रीभोाजराज त्रिभुवन विजयी धा्मिकस्ते पिताऽभूत पित्रा तेन गृहीता नवनवतिमिता रन्नरकोटिर्मदीया॥ ता त्यं देहि त्वदीयंस्सकलट बुध वरोर्नायते वृत्तमेत- न्नचेख्रानंतितेव॑नवकनमयवा