(/4)॥ रत

..«,// छोटेलाल जैन $ टक,ती भीवीर-शासन-सघ ४०4१६; इरद्पव्रि्लास रोड, कलकत्ता[२७

प्राप्ति स्थान (१) वीर-सेवा-मन्दिर २१, द्रियागज, देदली

(२) वीर-शासन-संघ २६, इन्द्रविश्वास रोड, कल्नकत्ता ३७

भुद्रक सन्मत्ति प्रेस ४३०, गली कुझस, दरीवा कल। देहली

प्रकाशकीय

“जैन साहित्य और इतिहास पर विद्वद प्रकाश” नामक ग्रन्थका यह प्रथम ण्ड पाठकोके समक्ष उपस्थित किया जा रहा है इसमें प्राच्य-विद्या- ्ट क्राचार्य्षी जुगलकिशोरजी म्रुख्तारके उन लेखोका संग्रह है, जो समय पर अनेकान्तादि पत्रोमें श्रौर अनेक स्व-पर-सम्पादित ग्रंथो की में प्रगट होते रहे हैं। लेखोकी सख्या इतनी श्रधिक है, कि यह सभ्नह छण्डोमें प्रकाशित करना होगा इस प्रथम खण्डमें ही ७५० के लगभग

हो गये है दूसरे खण्डोमें भी प्राय इतने इतने ही पृष्ठोकी समावना है इतिहास-अनुसधाताओं झर साहित्यिकोके लिए नई नई खोजो एवं [विषशाप्रोको लिए हुए ये लेख बहुत ही उपयोगी हैं, और नित्य के उपयोगमें प्वामैकी चीज हैं भ्र्थात्‌ एक अच्छी [रेट(८एट८7९०८ 000: के रूपमें स्थित हैं ग्रतएव इन सब लेखोको एकच्नित कर पुस्तकके रूपमें निकालनेकी भ्रतीव झ्रावष्यकता थी प० नाथूरामजी प्रेमीके जेन साहित्य झौर इतिहास विपयक लैेखोका एक सग्रह कुछ वर्ष पहले प्रकाशित हुआ था वह कितना उपगोगी सिद्ध हुआ, इसे उपयोगमें लाने वाले विह्मान्‌ जानते हैं| इस सम्रहमें उस सम्रह के कुछ लेखो ०र भी कितना ही नया तथा विद्वद प्रकाण डाला गया है। जैनोंके प्रामाणिक इतिहासके निर्माणर्म इस ध्रकारकी पुगतत्त्व सामग्रीकी अतीव श्रावर्यकता है। जैनसमाजमें इस प्रकारके यग्रुग-प्रवर्तक विहानोमें ५० हुगलकिश्योरजी मुख्तार श्रौर ५० नाथूरामजी प्रेमीके नाम ही झंग्रगण्य हैं। श्रत इन दोनो प्रावननविमर्श-विचक्षण विद्वानोका भारतीय

समाज सामान्यतः भौर जैन समाज विशेपत: ऋणी हैं |

रडं

इन लेघोको पढते हुए पाठकोको ज्ञात होगा, कि इनके निर्माण में लेखक को कितने अधिक श्रम, गम्भीर चिन्तन, भ्रनुभवन, मनन, एवं शोध-खोज से काम ज्ञेता पडा है। यद्यपि श्री मुख्तार सा० की नेखनजैली कुछ लम्बी होती है पर वह बहुत जेंची-नुली, पुनरावृत्तियों से रहित हर विपयको स्पष्ट करने वाली होनेंसे अनुसघान-शिक्षाथियोके लिए अ्रत्ीर उपयोगी पढती है और सदा मार्गे-दर्णक्रे रूपमें बनी रहती है इन लेखोसे भव हमारे इतिहासकी कितनी ही उलभने सुलक गई हैं | साथ ही अनेक वये विपयोके अनुसघान का क्षेत्र भी प्रशस्त हो गया है। कितने ही ऐसे प्रथोके नाम भी उपलब्ध हुए है, जिनके कुछ उद्धरण तो श्राप्त हैं, पर उन ग्रथोके श्रस्तित्वका भ्रभी तक पता नहीं चला | नाम-साम्य को लेकर जो कितनी ही श्रान्तिया उपस्थित की जा रही थी था प्रचलित हो रही थी, उन स्वका निरसन भी इन सब लेखोसे हो जाता है।

यद्यपि हमारा विज्ञाल प्राचीन साहित्य कई कारणोसे बहुत कुछ नष्ट- अष्ट हो चुका है, फिर भी जो कुछ अवशिप्ठ और उपलब्ध है, टसमें भी साहित्य इतिहास और तत््वज्ञानकी अनुसन्धान-योग्य बहुत कुछ सामग्री सन्निहित है, ग्रत उस परसे हमे प्राचीन साहित्यादिके अनुसघान करनेकी बहुत वड़ी आवश्यकता है। यह कार्य तभी सभव हो सकता है, जबकि हम सर्व प्रथम प्रपने आचार्योका समय निर्धारित कर लेवें तत्पदचांत्‌ हम उनके ध्ाहित्यमे श्रपनें इतिहास, संस्कृति और भाषा-विजानके सम्बन्धर्में श्रनेक प्रमूल्य विपयोका यथार्थ जान प्राप्त कर सकेंगे | भ्रत हमें उन बिल्ुत्त ग्रथोकी खोजका भी पूरा यत्न करना होगा, तभी सफलता मिल सकेगी |

भारतके प्रधानमन्त्री पडित जवाहरलानजी नेहरूने भ्रपने एक व्याख्यानमें , कहा था कि “प्रगर कोई जाति अपने साहित्य-उन्नननकी उपेक्षा करती है तो बडी से वडी घन-राणि भी उस जाति ( [ेंधप07 ) के उत्कपेमें सहायक नहीं हो सकती है साहित्य मनुष्यकी उन्नतिका सबसे वडा सावन है |

कोई राप्ट्र, कोई धर्म भ्रथवा कोई समाज साहित्य के बिना जीवित नहीं रह सकता, या यो कहिये कि साहित्यके विना राष्ट्र धर्म एव समाजकी कल्पना ही असभव है। सुप्रसिद्ध विह्मन्‌ कार्लाइलने कहा है, कि ईसाई

4

घमंके जीनेका कारण 'चाइबिल' है, यदि बाईविल होती तो ईसाई घर्मं कभी भी जीवित रह पाता?

भाषा किसी देशके निवासियोके मनोविचारोकों प्रगट करने का साधन भात्र ही नहीं होती, किन्तु उन देशवासियोकी संस्कृति का सरक्षण करने वाली भी होती है साहित्यके भ्रन्दर प्रादर्भूत हों कर कोई भी भाषा ज्ञान-। का संचित कोष एवं सस्कृतिका निर्मल दपुण बन जाती है। राष्ट्रको महान बनानेके लिये हमें तम्नपनी गौरवमय भ्रतीत सस्क्ृतिका ज्ञान होना अत्यावश्यक है |

साहित्यकी तरह इतिहास भी कम महत्वक्री वस्तु नहीं है। हम लोगोमें इतिहास-मूलक ज्ञानका एक प्रकारसे अ्रभाव सा हो गया है हमारी कितनी ही महत्वकी साहित्यिक रचनाओ्रोमें समय और कर्ताका नाम तक भी उप- लव्घ नही है सामाजिक सस्क्ृतिकी रक्षाके लिये ऐतिहासिक ज्ञान और भी आवष्यक है। पुरातत्वके प्रष्ययनलके लिये मानव-विकासका ज्ञान अनिवार्य है, सौर यह तभी सभव है जब कि हम अपने साहित्यका समयानुक्रम दृष्टिसे अध्ययन करनेमे प्रवृत्त हो।

इतिहाससे ही हम अपने पुर्वंजो उत्थान श्रौर पतनके साथ साथ उनके कारणोको भी ज्ञात कर उनसे ययथेप्ट लाभ उठा सकते हैं

हमें अपने पूर्व महापुरुषोकी स्मृतिक्रो अक्षुण्ण बनाये रखना होगा जिससे हमारी सवानके समक्ष अनुसरण करनेके लिये समुचित आदर्श रहे साथ ही अपने पूर्वजोम श्रद्धा बढ़ानेके लिये यह भी भ्रावदयक है कि हम उनके साहित्य एवं भ्न्य कृतियों का ययायं ज्ञान प्रास करें।

किसी भी देशका, घर्मका और जातिका भरूतकालीन इतिहास उसके वर्तमान झौर मविष्यक्रो सुगठित करनेके लिये एक समर्थ साघन है। इतिहास, जानकी अन्य गराखाओकी भानि, सत्यको भर तथ्यपूर्ण घटनाझ्रोको प्रकाशित करता है, जो साधारणत: आँखोसे ओमन होती हैं |

इस समप्नहकी प्रगटठ करनेके लिये मे कई वर्षोनि चेष्टठा कर रहा था, शझौर श्रीमुत्तार सा० से कई बार निवेदन भी किया गया ह्रिवेश्रपने लेखोकी

पुनरावुत्तिके लिये एक वार उन्हे सरमरा नजरस दख जाय प्रौर जहा कही सशोधनादिकी जरूरत हो उसे कर देदें। पर उन्हें अनवकाशकी बराबर

््‌

शिकायत बनी रहनेके कारण यह काम इससे पहिले सम्पन्न नही हो सका, भ्रस्तु

श्राज इस चिरप्रतीक्षित लेखसग्रहके प्रथम खण्डकों पाठकीके समक्ष रखते हुए मुझे बडी प्रसत्तता हो रही है भागा है पाठक इस महत्त्वपूर्ण लेखसग्रहसे यथोचित लाभ उठाने में समर्थ होगे।

भ्रस्तमें मै इतना भर भी प्रगट कर देना चाहता हु, कि इस सप्रहमें ३२ लेखो-निब्रन्धोका सग्रह है जैसा कि लेख-सुचीक्षये प्रगट है श्रन्तका 'समन्‍्त- भद्रका समयनिशंय' नामका ३शवा लेख म्रुस्तारसा०की हालकी नई रचना है,वह उस समयसे पहिले नहीं लिखा जा सका जो उसपर दिया हुप्रा है, भौर इसीसे उसे समन्तभव्न-सम्वन्धी लेखोके सिलसिलेमे नहीं दिया जा सका | उच्तके पू्॑वर्ती लेखपर भी जो नम्बर ३९ पडा है वह छुपनेकी गलतीका परिणास है, “छपने में २६के वाद लेखों पर झादि नम्पर पड गये हैं, जबकि वे २७ आदि होने चाहिये भौर तदनुसार सुधार किये जानेके योग्य हैँ

कलकत्ता छोटेलाल जेन ज्येष्ठ सुदी ( श्रुतपश्चमी ) मंत्री--भश्रीवीरशासनसंघ वीर नि० सम्बत्‌ २४८२ कलकत्ता

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जा ला मा

# इस सूचीमें यह भी सूचित कर दिया गया है कि कौन लेख प्रथमत कब-

/ जहा प्रकाशित हुआ है और जिन लेखोका निर्माण-काल मादुम हो सका है उनका वह समय भी लेखके भ्रतन्तर दे दिया गया है

लेख-सूची

भगवान सद्दावीर ओर उनका समय ( अनेकान्त वर्ष मंगसिर वीर स०२४५६ ) धीर-निर्वाण-सम्वत्की समालोचना पर विचार छ्५

(अनेकान्त वष नवम्वर १६४७ ) बीर-शासनको उत्पत्तिका समय ओर स्थान ( झने० १६४३ ) ४७ जैन तार्थकर्रांका शासन-भेद (जैनहितैषी वर्ष १९ भगस्त १६१६) ६७ 2४ श्रुतावतार-कथा (वीर अव्द्ृवर १६३६) घ० श्रीकुन्दकुन्दाचाय ओर उनके पन्ध, दिसम्बर १६४८ प६ ( पुरातन जैनवाक्य-सूची-प्रस्तावना सन्‌ १६४०) तत्त्वाथसूजके कर्ता कुन्दकुन्द (पते०वर्ष वीरसम्बत्र४५६) १०२ उसास्वाति या उसास्वासी ( भने० वर्ष वीरस० २४५६ ) १०६ तत्त्वाथसूत्रकी उत्पत्ति( पने० वर्ष बीर सम्बत्‌ २४५६) १०६ १० तत्त्वाथाधिगम सूत्रकी एक संटिप्पण प्रति, ११ नवम्बर १६९३६ ११२ ( प्ने० वर्ष वीर स० २४६६ )

११ श्व० तत्त्वार्थसूत्न ओर उसके भाष्यकी जाच, १२५ १८ जुलाई १६४२ " झनें० वष सन्‌ १६४२ ) १२ स्वामी समन्तभद्र, वैश्याख शुक्ल सम्बत्‌ १६८२ १४६

( रत्नक० प्रस्तावना-स्वामी समन्तभद्र) १३ समन्तभद्रका मुनि-जीवन ओर आ्रपत्काल र्‌०छ १४ समन्तभद्रका एक और परिचय पच्य, दिसम्बर १९४४. ०४१ ( भ्ने० वर्ष सन्‌ १६४४ ) १४ स्वामी समन्तभद्र घमेशास्त्री, तार्किक और यायगी तीनों थे. २४५ २७ दिसम्बर १६४४ (प्रतें० वर्ष सनू १६४४ ) १६ समन्तमभढ़के मंथोंका सक्षिप्त परिचय ( रत्लक० भ्रत्ता०) श्ध्८ १७ गधह्ति भद्दाभाष्यकी खोज, वैगाख॒ सुदि स०१६८२ २७२ ( जेनहितैषी १६२० रत्न० प्रस्तावना सन्‌ १६२५ ) १८ समन्तभद्रका समय ओर डाक्टर के० ब्री० पाठक (जैनजगत वर्ष जुलाई सन्‌ १६३४)

प्प

१६ सर्वोर्थभिद्धिपर समन्तभद्गका प्रभाव (प्रन०दिसम्बर १९४२) 4२३

२० समनन्‍्तभद्रक्नी स्तुतिविद्या (स्तुतिविद्या-प्रस्ताववा जुनाई १६५०) ३४०

२१ समन्तभद्गका स्वयम्भूस्तोश्र(स्वयम्भूस्तोत्र-प्रस्तावता चुलाई४१) ३४८

२९ ममन्तभद्गका युकत्यनुशासन ( युक्त्यनु० प्र० जुलाई १६५१) ४२६

श२३ रत्नकरण्डके करत व्व-विपयमं मेरा विचार ओर निशेय ४३१ २१ अप्रैल १६४८ ( भ्रने० वर्ष सन्‌ १६४८)

२४ भगवती आराधना, दिसम्बर १६४८ छप९ ( पुरा० जैन वाक्यसूची-प्रस्तावना )

२५ भगवती आराधनाकी दूसरी/आ्राचीन टीका-टिप्पणियोँ.. ४८७ १० श्रगस्त १६३८ ( अने० वर्ष वीर स० २४६५ )

२६ कार्तिकरेयानुप्रेज्ञा और स्वामिकुमार, दिसम्बर १६४८ ४६२ ( पुरा० जैन वाक्यसूची-प्रस्तावना )

२७ सन्मतिसुत्र ओर सिद्धसेन, ३१ दिसम्बर १९४८ ४०१ ( श्रने० वर्ष ९, दिसम्बर १६४८) र८ तिलाय्पण्णत्ती ओर यतिव्पभ,दिसम्वर १६९४८ ४८६

( पुरा० जेनवावयसूची प्रस्तावना ) २६ स्वामी पात्रकेसरी ओर विद्यानन्द, १६ दिसम्बर १६२९. ३७ ( भ्रने० वर्ष वीर स० २४५६ ) ढ़ द्वितीय लेख, १७ जुलाई १६३६ (प्रने० वर्ष २) द््श्प ३० कदम्बव॑शीय राजाओके तीन ताम्रपत्र (जैनहिं० जून १६२०) ६६८ ३१ आये और स्त्ेच्छु, १७ दिसम्बर १६३८ (अने० वर्ष २). $७प ३२ समन्तभद्रका समय-निरणेय, मगमसिर सुदि स० २०११. दम

परिशिष्ट काव्य-चित्रोका सोदाहरण परिचय ६६८ अहत्सम्वोधन-पदावली ७०६ स्वयम्भू-स्तवन -छन्द-सूची ७८७ नामाश्तुक्रमणी ७१३

#०-7न्‍यवाईफ बह पुड----क.

श्‌ «भगवान महावीर और उनका समय

लि पिनीननन तन 5

शुक्दिशिक्तयो! पता काष्ठा योउवाष्य शान्िमुत्तमास | देशयामात सद्धमा॑ महावीर नमामि तस्‌

महावीर-परिचय

जैनियोके अन्तिम तीर्यंकर सगवान्‌ महावीर विदेह ( विहार ) देशस्थ कुण्ड-

पुर & के राजा 'पिद्धार्थ के पुत्र थे और माता “प्रियकारिणी'के गर्भसे उत्पन्न हुए थे, जिसका दूसरा नाम 'ब्रिशला भी था और जो वंगालीके राजा चेटकः -

की सुपुत्री] थी। आपके शुभ जन्मसे चंत्र शुक्ला त्रयोदशीकी तिथि पवित्र हुई

और उसे महान्‌ उत्सवोके लिये पर्वका-सा गौरव प्रात हुआ इस तिथिकों जन्म-

समय उत्तराफाल़ुनी नक्षत्र था, जिसे कही कही 'हस्तोत्तरा' ( हस्त नक्षत है आए अजीब बम के पक लय मिल लक जज मफब अजीज कल मिफ बज सब मद लञन- जिसमे सरलता पक

& इवेताम्वर सम्प्रदायके कुछ ग्रन्थोमे क्षत्रियकुण्डर ऐसा नामोल्लेख भी मिलता है जो समवत: कुण्डपुरका एक मुहल्ला जान पडता है। अन्यथा, हँसी सम्प्रदायके दूसरे ग्रन्थोमें कुण्डभामादि-हूपसे कुण्डपुरका साफ उल्लेख पाया जाता है। यया:-- है “त्युत्तेराहि जाओ कु डग्गामे महावीरों ।” झआ० नि० भा०

' थह कुष्डपुर ही आजकल कुण्डलपुर कहा जाता है,जो कि वास्तवम वैज्ञागीका उपंनगर था। [ कुछ दवेताम्वरीय अन्धो्मे (वहन “लिखा है। * :८

जैनसाहित्य और इतिहासपर विशद्‌ प्रकाश

उत्तरमें-अनन्तर-जिसके ) इस नामसे भी उल्लेखित किया गया है, ओर सौम्य ग्रह प्रपने उच्चस्थान पर स्थित थे, जैसा कि श्रीयृज्यपादाचार्यके निम्न वाक्‍्यसे प्रकट है :--- चैत्र-सितपक्ष-फाल्गुनि शशांकयोगे ठिने त्रयोदश्याम्‌ जज्ञे स्वोचस्थेपु भ्रदेपु सौम्येपु शुभलग्ने ॥४॥ --निर्वाणभक्ति तेज पुज्ञ भगवान्‌के गर्भमें आते ही सिद्धार्थ राजा तथा अन्य कुद्म्भीजनोकी श्रीवृद्धि हु--उनका यज, तेज, पराक्रम और वैभव बढा--माताकी प्रतिभा श्रमक उठी, वह सहज ही में अनेक गढ़ प्रब्नोका उत्तर देने लगी, और प्रजाजन भी उत्तरोत्तर सुख-शान्तिका अधिक अनुमव करने लगे | इससे जन्मरालमे आपका सार्थक नाम 'वर्दमान' रकखा गया साथ है,, वीर महावीर और सन्मति जैमे तामोकी भी क्रमण सूष्टि हुईं, जो सब आपके उस समय प्रस्फुटित तथा उच्छ- लित होनेवाले ग्रुणो पर ही एक आधार रखते है ! महावीरके पिता 'णात” वशके क्षत्रिय थे। रात यह प्राकृत भाषाका जब्द है शौर 'नात? ऐसा दन्त्य नकारसे भी लिखा जाता है। सस्कृतमें इसका पर्यायरूप होता है जात? इसीसे 'चारित्रभक्ति' में श्री पुज्यपादाचार्यने “श्री- मज्ज्ञातकुलेन्द्रना?? पदके द्वारा महावीर भगवानूको ज्ञात वंगका चन््रमा लिखा है, और इसीसे महावीर 'णातपुत” अथवा 'ज्ञातपुत्र' भी कहलाते थे, जिसका वौद्ादि ग्रन्योमें भी उल्लेख पाया जाता है। इस प्रकार ' वशक्रे ऊपर नामोका उस समय चलन था--ब्रुद्धंदेव भी अपने वश परसे 'शावम्रपुत्र' कहें जाते थे। ' भ्रस्तु, इस 'नात' का ही बिगड़ कर अथवा लेखकों या पाठकोकी नासममीकी बजहंसे वादको 'नाथ' रूप हुआ जान पडता है। और इसीसे कुछ ग्रन्थोमें महावीर॒की नाथवर्णी लिखा हुआ मिलता है, जो ठीक नही है महावीरके वाल्यकालकी घटनाओझोमेंसे दो घटनाएँ खास तौरस उल्नेखयोग्य हें---एक यह कि, सजय भौर विजय नामके दो चारण-मुनियोको तत्त्वार्थ-द्िप्यक कोई भारी सदेह उत्पन्न हो गया था, जन्मके कुछ दिन वाद ही जव उन्होने आपकी देखा तो आपके दर्शनमावसे उनका वह सव सन्देह तत्काल दूर हो गया और इस-

# देखो, भुणमद्राचायंक्रत भहापुराणकाः एडवाँ पं .. ,

कुटमन

भ० महावीर और उनका समय ३-

लिए उन्होने वडी भक्तिसे आपका नाम 'स्मति' रक्‍्खा & दूसरी यह कि, एक दिन आप बहुतसे राजकुमारोके साथ वनमें वृक्षक्रीड़ा कर रहे थे, इतनेमे वहाँ पर एक महाभयकर भौर विशालकाय सर्प भ्रा निकला शौर उस वृक्षकों ही मूलसे लेकर स्कंघ पर्यन्त वेढकर स्थित हो गया जिस पर आप चढे हुए थे। उसके विकराल रूपको देखकर दूसरे राजकुमार भयविज्ञल हो गये और उसी दद्षामें वृ्षों परसे गिरकर अथवा कूद कर झपने अपने घरको भाग गये। परन्तु आपके हृदयमें.ज़रा भी भयका सचार नही हुआ--आप विलकुल निर्मयचित्त होकर उस काले नागसे ही क्रीडा करने लगे और आपने उस पर सवार होकर अपने बल तथा पराक़मसे उसे खूब ही घुमाया, फिराया तथा निर्मद कर दिया उसी वक्तसे झ्राप लोकमें 'महावीर' नामसे प्रसिद्ध हुए | इन दोनो| घटनाओोसे यह स्पष्ट जाना जाता है कि महावीरमें वाल्यकालसे ही बुद्धि और शक्तिका असाधारण विकास हो रहा था और इस प्रकारकी घटनाएँ उनके भावी असाधारण व्यक्तित्वको सूचित करती थीं। सो ठीक ही है-- “हेनहार विरवानके होत चीकने पात |” प्राय: तीस वर्षकी अवस्था हो जाने पर महावीर॑ ससार-देहभोगोसे पूर्रोतया विरक्त हो गये, उन्हे अपने आत्मोत्कएंको साधने और अपना अन्तिम ध्यय प्राप्त करनेकी ही नही किन्तु ससारके जीतव्रोको सन्मागेमें लगाने अथवा उनकी सच्ची सेवा बजानेकी एक विशेष लगन लगी--दीन दुखियोकी पुकार उनके हृदयमें घर कर गई--और इसलिये उन्होने, श्रव भोर श्रधिक समय तक ग्ृहवासको उचित समभकर, जगलऊा रास्ता लिया, सरूर्णे राज्यवैभवकों ठुकरा दिया झौर इन्द्रिय- & सजयपस्यार्थसदेहे सजाते विजयस्यथ च। पड जन्मानन्तरमेवैनमम्येत्यालोकमात्रत: तत्सदेहगते ताभ्या चारणाम्या स्वभक्तित: अस्त्वेष सन्‍्मतिर्दंवों मावीति समुदाहृत: --भहापुराण, पर्व ७४वाँ |. | इनमेंसे पहली घटनाका उल्लेख प्राय; दिगम्बर ग्रन्योमें और दूसरीक़ा दिगम्बर तथा इवेतास्वर दोनो ही सम्प्रदायके ग्रन्योमें बहुलतासे पाया जाता है

है जैनसाहित्य और इतिहासपंर विशद प्रकाश

सुखोसे मुख मोडकर मगसिरवदि १० मीको 'ज्ञातखंड' नामक बनमें जिनदीक्षा घारण करली | दीक्षाके समय आपने सपूर्ण परिग्रहका त्याग करके ग्राकिचन्य अपरिग्रह) ब्रत प्रहशकिया, अपने शरीर परसे वस्त्राभूपणोकों उतार कर फेंक दिया | भौर केशोको क्लेशसमान समभतते हुए उनका भी लौच कर डाला | भ्रव पाप देहसे भी निर्ममत्व होकर नग्न रहते थे, सिहकी तरह निर्भय होकर जंगल- पहाडोमें विचरते थे और दिन रात तपद्चरण ही तपश्चरण किया करते थे विशेष सिद्धि और विशेष लोकसेवाके लिये विशेष ही तपदचररंगकी जरूरत होती है--तपश्चरण ही रोम-रोममे रमे हुए भ्रान्तरिक मलको छाँट कर आत्मा - को शुद्ध, साफ, समर्थ और कार्यक्षम बनाता है इसीलिये महावीरको बारह वर्ष तक घोर तपर्चरण करना पडा--छूब कडा योग साधना पडा--तव कहीं जाकर भापकी शक्तियोका पूर्ण विकास हुआ इस दुद्धंर तपदचरण॒की कुछ घटनाग्रोको मानूम करके रोगटे खडे हो जाते हैं। परन्तु साथ ही आपके असाधारण धैय॑, भ्रटल निरचम, सुदृद आत्मविश्वास, अनुपम साहस और लोको- त्तर क्षमाणीलताको देखकर हृदय भक्तिसे भर भ्राता है भौर खुद-वखुद (स्वयमेव) स्तुति करनेमे प्रवृत्त हो जाता है। भस्तु, मनःपर्ययज्ञानकी प्राप्ति तो आपको दीक्षा लेनेके वाद ही होगई थी परन्तु केवलज्ञान-ज्योतिका उदय वारह वर्षके उग्र तपे- एचरणुके वाद वेशाख सुदि १० मी को तीसरे पहरके समय उस वक्त हुआ जब कि श्राप जुम्भका ग्रामके निकट ऋझुकूला नदीके किनारे, क्षाल वृक्षके नीचे एक दिला पर, पष्ठोपवाससे युक्त हुए, क्षपक्नेणि पर आरूढ थे--आपने शुब्ल- ध्यान लगा रकखा था--भौर चन्रमा हस्तोत्तर नक्षत्रके मध्यमें स्थित या

| कुछ दवेताम्बरीय ग्रन्योमें इतना विशेष कथन पाया जाता है झौर वह सभवत साम्प्रदायिक जान पडता है कि, वस्थाभूषणोको उतार डालने वाद इन्द्रने 'देवदृश्थ तामका एक बहुमूल्य वस्त्र भगवानूर्क कन्धे पर डाल दिया था, जो १३ महीने तक पडा रहा वादको महावीरने उसे भी त्याग दिया और वे पूर्णरूपसे नग्त-दिगम्बर अथवा जिनकल्पी हो रहे

मे. केवलज्ञानोत्पत्ति के समय और क्षेत्रादिका प्राय: यह सब वर्णन 'धवल' और 'जयववल नामके दोनो सिद्धान्तग्रन्थोमें उद्घृत तीन प्राचीन गायाझोमें भी पाया जाता है, जो इस प्रकार हैं :--

भ० महावीर ओर उनका समय भ्‌

जैसा कि श्रीपुज्यपादाचार्यके निम्न वाक्योंसे प्रकट है :-- प्राम-पुर-खेट-कववेट-मटन्ब-घोषाकरान्‌ प्रविजद्दार उम्मेस्तपोविधानैद्ां द्शवर्पाख्यमरपूज्य ॥श्णा ऋजकूत्नायात्तीरे शालइ्रमसंश्रिते शिक्षापट्ट अपराहे पष्ठेनास्थितस्य खलु जम्मकाग्रामे ॥११॥ वैशाखसितदशम्यां हस्तोत्तरमध्यमाश्रिते चन्द्रे क्षुपक्रेण्यारूठस्योत्पन्न॑ केवलज्ञानम्‌ू १२ “-निर्वाखभक्ति इस तरह घोर तपर्चरण तथा ध्यानाग्नि-ठवारा, ज्ञानावरणीय दर्शनावरणीय मोहनीय और अन्तराय नामके घातिकर्म-मलको दग्ध करके, महावीर भगवानूने जब अपने झात्मामें ज्ञान, दर्शन, सुख झौर वीय॑ नामके स्वामाविक ग्रुणोका पूरा विकास भथवा उसका पूर्ण रूपसे आविर्भाव कर लिया और आप अनुपम शुद्धि, शक्ति तथा शान्तिकी पराकाणष्ठाको पहुँच गये, भ्रथवा यो कहिये कि श्रापको स्तव्रात्मोगलब्धिहूप “सिद्धि' की प्राप्ति हो गई, तव भापने सब प्रकारसे समर्थ होकर ब्रह्मपथका नेतृत्व ग्रहण किया और सथ्वारी जीवोकों सम्मार्गका उपदेश देवेके लिये--उन्हें उवकी भूल सुकाने, वन्धनमुक्त करने, ऊपर उठाने और उनके दुःख मिटानेके लिये--अपना विहार प्रारम्भ किया। दूसरे शब्दोमे कहना चाहिये कि बोकहित-म्रघनाका जो असाधारण विचार आपक। वर्षोसे चल रहा था और जिसका गहरा सस्कार जन्मजन्मान्तरोंसे झ्ापके भात्मामें पडा हुआ था वह भब संपूर्ण रुकावटोके दूर हो जाने पर स्वत: कार्यमें परिणत हो गया विह्वर करते हुए श्राप जिस स्थान पर पहुँचते थे शोर वहाँ झ्ापके उपदेशके बिए जरे महती समा जुडती थी भौर जिसे जेनसाहित्यमें 'समवसरंणश' नामंसे

यमइय छदुमत्यत्त वारसवासारि पचमासे थ। पण्णरसाणि दिणारि तिरयणसुद्धों महावीरों ॥१॥ उजुकूलणदीतीरे जंभिययामे वह सिल्ावट

चंद णादादेंतो '्रवरण्दे पायछायाएं ॥२॥ चइसाहजोण्हपक्ले दसमीए खबगसेढिमारुढ़ढों |

ह॒तुणु घाइकम्म केवलणाण समावण्णो ॥३॥

मर जैनसाहित्य और इतिहासपर विशद प्रकाश

उल्लेद्वित किया गया है उसकी एक खास विधेपता यह होती थी कि उसका हार सबके लिये मुक्त रहता था, कोई किसीके प्रवेशमे वाघक नहीं होता था--पश्ुपक्षी तक भी श्राक्ृष्ट होकर वहाँ पहुँच जाते थे, जाति-पाँति छूताधूत भौर ऊँचनीचका उसमे कोई भेद नहीं था, सब मनुष्य एक हो मनृष्पजातिमें परिंगणित होते थे, और उक्त प्रकारके भेदभावको भूलाकर आपसमें प्रेमके साथ रल-मिलकर वैठ्ते और धर्मश्रवण करते थे --मानो सव एक ही पिताकी सतान हो इस आदंदंसे समवसरण्म भगवान्‌ महावीरकी समता और उदारता मूर्तिमती नज़र श्ात्ी थी और वे लोग तो उसमें प्रवेश पाकर बेहद सतुष्ट होते थे जो समाजके भ्रत्याचारोसे पीडित थे, जिन्हे कभी धर्मश्रवराका, शास्त्रोके भ्रध्ययनका, अपने विकासका भर उनच्चसस्कृतिको प्राप्त करनेका अ्रवसर ही नही मिलता था भ्रथवा जो उसके अधिकारी ही नहीं समझे जाते थे इसके सिवाय, समवसरणकी भूमिमें प्रवेश करते ही भगवान्‌ महावीरके सामीप्यसे जीवोका वैरभाव दूर हो जाता था, कर जत्तु भी सौम्य वन जाते थे शौर उनका जाति-विरोध तक मिट जाता था। इसीसे सर्पको नकुल या मयूरके पास वैठनेमें कोई भय नही होता था, चूहाँ विना किसी सकोचके विल्लीका आालिगन करता था, गौ और सिही मिलकर एक ही नाँदमें जल पीतो थी भौर मृग-शावक खुशीसे सिह-शावकके साथ खेलता था। यह सब महावीरके योगवलका माहात्म्य था। उन्तके श्ात्मारमें भ्रहिंसाकी पूर्ण प्रतिष्ठा हो चुकी थी, इसलिये उनके सनिकट अथवा उत्तकी उपस्थितिमें किसी- का बैर स्थिर नही रह सकता था पततजलि ऋषिने भी, भ्रपने योगदर्शनमें, योगके इस माहात्म्यकों स्वीकार किया है, जैसा कि उसके निम्न सुभरसे प्रकठ है;-- ; अह्िसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधो बैरत्याग: ॥१५॥

जैनशास्त्रोमे महावीरके विहारसमयादिककी कितनी ही विभूतियोका--अति- शयोका--वरुंन किया गया है। पस्तु उन्हे यहाँ पर छोडा जाता है। क्योकि स्वामी समन्तभद्वने लिखा है।--- देवागम-नभोयान-चामराद्-विभूतयः सायाविष्वपि दृश्यन्ते नातस्त्वमसि नो भद्दान्‌ ॥१॥ --आ्राममीणासा

! भर० महावीर और उनका समय

अर्थातू--देवोका आगमन, झाकाझमें गमन और चामरादिक ( दिव्य चमर, छत्र, पिहासन, भाभडलादिक ) विभूतियोका भ्रस्तित्त तो मायावियोमैं--इस्दर- जालियोमें--भी पाया जाता है, इनके कारण हम शझ्रापको महान्‌ नहीं मानते और इनकी वजहसे आपकी कोई खास महत्ता या वढाई ही है

भगवान्‌ महावीरकी महत्ता और वडाई तो उनके मोहनीय, ज्ञानावरण, दर्शंनावरण और अत्तराय नामक कर्मोका नाश करके परमशान्तिको लिये हुए & शुद्धि तथा शक्तिकी पराकाष्ठाकों पहुँचने और ब्रह्मपथका--अहिसात्मक मोक्ष मार्यका--नैतृत्व ग्रहण करनेमें है--अथवा यो कहिये कि आत्मोद्धारके साथ- साथ लोककी सच्ची सेवा वजानेंमें है। जैसा कि स्वामी समन्तभद्बके निम्त वावय- से भी प्रकट है :---

तवं शुद्धिशक्त्योरुदयस्य काएं तुलाज्यतीतां जिन शान्तिरूपाम्‌

अवापिथ ज्द्मपथस्य नेता सह्यानितीयत्‌ प्रतिवक्तुमीशा:॥ ४॥

हि “-अवत्यनुशासन

महावीर भगवान्‌ने प्राय त्तीस वर्ष तक लगातार अनेक देक्ष-देशान्तरोमे विहार करके सन्मार्गका उपदेश दिया, भसर्य भारियोके अज्ानान्थकारको दूर करके उन्हें यथार्थ वस्तु-स्थितिका बोध कराया, तत्त्वा्थंको समझाया, भूले दूर की, अम मिटाए, कमजोरियाँ हटाई, भग भगाया, भ्ात्मविश्वास बढ़ाया, कदाप्रह दूर किया, पास्ण्डबल घटाया, मिथ्याल छुडाया, पतितोको उठाया, भ्रन्याय- अत्याचारकी रोका, हिंसाका विरोध किया, साम्यवादको फैलाया और ल्ोगोको स्वावलम्वन तया सयमकी शिक्षा दे कर उन्हे आत्मोत्कपंके मार्ग पर लगाया। इस तरह आपने लोकका अनन्त उपकार किया है और आपका यह विहार बड़ा ही उदार, प्रतापी एवं यशस्वी हुआआ है। इसीसे स्वामी समन्तमद्रकें स्वयभू- स्तोत्रमे (गिरिमित्यवदानवतः? इत्यादि पद्चके द्वारा इस विहारका यत्किचित्‌ उल्लेख करते हुए, उसे “ऊजितं गत”? लिखा है

छः ज्ञानावरण-दर्शनावरणके भगावते निर्मतर श्ञान-दर्शनक्ी आ्रधिम लिक्ता भाम शुद्धि! भर अन्तराय कर्मके नादसे वीम॑लब्धिका होना शक्ति? है और भांहनीय कर्मके अंभावस्ते अतुलित सुखकी प्रासिका होता परमंशान्तिः है)

पं जैनसाहित्य और इतिहासपर विशद प्रकाश

भगवादूका यह विहार-काल ही प्राय: उनका तीर्थ-प्रवर्तनकाल है, भौर इस तीय्थ॑-प्रवर्ततकी वजहसे ही वे 'ठीर्थकर' कहलाते हैं # आ्रापके विहारका पहला स्टेशन राजगृहीके निकट विपुलाचल तथा वैभार पर्वतादि पच पहाडियो- का प्रदेश जान पडता है | जिसे धवल भर जयधवल नामके सिद्धान्त ग्रन्थोमें क्षेत्ररूपसे महावीरका भ्र्थकतृ त्व प्रस्पण करते हुए, 'पचईलपुर' नामसे उल्लेखित किया है &। यही पर आपका प्रथम उपदेश हुआ है--केवल- ज्ञानोलत्तिके पण्चात्‌ श्रापकी दिव्य वाणी लिरी है--और उस उपदेशके समयसे ही आपके तीर्थकी उत्पत्ति हुई है $। राजगृहीमें उस वक्त राजा

%# 'जयधवल' में, महावीरके इस तीर्थ॑प्रवर्तन भौर उनके भ्रागमकी प्रमाणता- का उल्लेख करते हुए, एक प्राचीन गायाके आधार पर उन्हे “विःशश्वणयकर/ ( जगतके जीवोके सन्देहको दूर करने वाले ), “वीर? (ज्ञान-वचनादिकी सातिशय दतक्तिसे सम्पन्न ), 'जिनोत्तम? ( जितेन्द्रियों तथा कर्मजेताओंमें श्रेष्ठ ) राग्नद्वेप- भयसे रहित” और 'धर्मंतीर्थ-प्रवर्तंक! निखा है। यथा--- ह॒

णिस्ससयकरो वीरो महावीरो जिखुत्तमी राग्र-दोस-भयादीदो धम्मतित्यस्स कारझो !

आप जूम्मका ग्रामके ऋजुकूला-तट्से चलकर पहले इसी प्रदेशमें भाए हैं। इसीसे श्रीपूज्यपादाचार्यने श्रापकी केवलज्ञानोत्पत्तिके उस कथनके भ्रनन्तर जो ऊपर दिया गया है झापके वंभार पव॑त पर आनेकी बात कही है और तमीसे आपके तीस वर्षके विहारकी गराना की है। यथा--

“अ्ष भगवान्सम्प्रापहिव्य वैमारपर्वत रम्यं चातुर्वेष्य-सुसघस्तत्राभूद्‌ गौतमग्रमृति ॥१३॥ “ददाविधमनगाराणामेकादशघोत्तर तथा पर्म - देशयमानो व्यहरतु भिगहर्पाण्यथ जिनेन्द्र, १४॥ --निर्वाणभक्ति। & पचसेलपुरे रम्मे विउले पत्चदुत्तमे णाणाहुमसमाइण्णों देवदाशववदिंदे महावीरेण (अ) त्यो कहिप मवियलोग्रस्स $ यह तीोसत्ति श्रावण-हृप्ण-पतिपदाक़ो पूर्वाण्ह ( सूर्योदय ) के समय

भ० महावीर और उनका समय.

अन्‍न्‍न्‍जन्‍रयजा+यन्‍नकम

कर मद कक 07266: जी तक कक पलक मा श्रेणिक राज्य करता था, जिसे विम्बसार भी कहते हैं उसने भगवान॒की परिषदोमे--समवशरण सभाग्रोमें--अरधात भाग लिया है और उसके प्रहनों पर बहुंतेसे रहस्योका उद्घाटन हुआ है। श्रेशिककी रानी चेलना भी राजा चेटककी पुत्री थी और इसलिये वह रिव्तेमें भहावीरकी मातृस्वसा ( मावसी ) | होती थी इस तरह महावीरका अनेक राज्योके साथमें शारीरिक सम्बन्ध भी

था। उनमें आपके धर्मंका बहुत प्रचार हुआ और उसे अच्छा राजाशय मिला है। - विहारके समय महंवीरके साथ कितने ही मुनि-आभिकाझों तथा आ्ञवक- भाविकाओका सध रहता था झापने चतुविध सघकी भ्रच्छी योजना और बडी ही सुन्दर व्यवस्था की थी। इस सधके गणाघरोकी संख्या ग्यारह तक पहुँच गई थी और उनमें सबसे प्रधान गौतम स्वामी थे, जो “इन्द्रभुति' नामसे भी प्रसिद्ध हे भौर समवसरणुमें मुख्य गणघरका कार्य करते थे। ये गौतम-गोत्री और सकल वेद-वेदागके पारगामी एक वहुत बडे ब्राह्मण विदान्‌ थे, जो महावीरको केवलज्ञानकी सश्रासि हीनेके पश्चान्‌ उनके पास अपने जीवाओ॥्जीव- विपयक सन्देहके निवारणार्थ गये थे, सन्देहकी निवृत्तिपर उनके शिष्य बन गये थे और जिन्होने श्रपने वहुतसे शिष्षोंके साथ भगवानूसे जिनदीक्षा लैली थी भस्तु तीस & वर्षके लम्बे विहारको समाप्त करते भौर क्ृतकृत्य होते हुए, भगवान्‌

प्रभिजित नक्षत्रपे हुई है, जैसा कि घवल सिद्धान्तके निम्न वाकधसे प्रकट है-- वासस्स पढममासे पढमे पवल्चम्मि सावशों बहुले। पाडिवदपुव्नदिवसे तित्युप्पत्ती दु अभिजिम्हि ॥शा

कुछ स्वेताम्वरीय ग्न्यानुसार 'मातुलजा--मामूजाद वहन

& घवल सिद्धान्तमें--और जयधवलमे भी--कुछ झ्ाचायकि मतानुसार एक प्राचीन गाथाके आधार पर विहारकालकी सख्या २६ वर्य महीते २० दिन भी दी है, जो केवलोत्यति और निर्वाण॒की तिथियोको देखते हुए ठीक जान पढती है। और इसलिये ३० वर्षकी महँ स्या 'स्थुलख्पसे ' सर्ममनी चाहिये। वह गाथा इस प्रकार है --

वासाणूणत्तीस पच मासे य. वीसदिवसे य॑ चउविहपणगारेहिं वारह॒हिं गणेहि विहरतो ॥१॥

१० जैनसाहित्य ओर इतिहासपर विशद प्रकाश

का मीट 2: रस पद 224 44ग 7296: 4202: पज कक / कक लव हर

महावीर जब पावापुरके एक सुन्दर उद्यानमें पहुँचे, जो श्नेक पद्म-यरोवरों तथा , नाना प्रकारके वृक्षसमूहोवे मह्ित था, तब श्राप वहाँ कायोत्मगेंसे स्थित हो गये और आपने परम शुक्षष्यानके द्वारा योगनिरोध करके दग्धरग्जु-ममान अवशिष्ट रहे कर्म-रजको--अ्रधातिचतुप्टयको--भी अ्रपने श्रात्मासे एयकू कर डाला, श्ौर इस तरह कातिक वदि श्रमावस्थाके दिन&, स्वाति नक्षत्रके समय, निर्वाश-दकों

>क>३ ७... 3 “न+मन 33 3०333... 3+3»3>ममाथक.2कावाकाओ, ााांाााआ

3-3. 3+->न+मननननमनान- 33 23-3-फ-«ममनमक---. रन

& घवल सिद्धान्तमे, “पच्छा पावाणयरे कत्तियमासे किग्हचोंदृिए | सादीए रत्तीए मेसरय छेत्त, णिव्वाश्रो ॥” इस प्राचीन गायाको प्रमाणमे उद्वृत करते हुए, कातिक वदि चतुर्दशीकी रात्रिको ( पच्छिमभाए - पिछले पहरमें ) निर्वाणका होना लिखा है। साथ ही, केवलोलत्तिसे निर्वाण तकके समय २६ वर्ष महीने २० दिनकी सगति ठीक बिठलाते हुए, यह भी प्रतिपादन किया है कि भ्रमावस्याके दिन देवेद्रोके द्वारा परिनिर्वाणपूजा की गई है वह दिन भी इस कालमें ग्ामिल करने पर कार्तिकके १५ दिन होते हैं। यथा --

“ग्रमावसीए परिणिव्वाणपूजा सयलदेविदेहि कया त्ति तपि दिवसमित्येव पक्खित्ते पण्णारस दिवसा होति ।”

इससे यह मालूम होता है कि निर्वाण अ्मावस्थाकों दिनके समय तथा दिनके वाद रात्रिकों नही हुआ, वल्कि चतुर्देशीकी रात्रिके श्रन्तिम भागमे हुआ है जब कि अ्रमावस्या भ्रा गई थी भ्ौर उसका सारा इत्य--निर्वाणपूजा और देहसस्कारादि--अ्रमावस्याको ही प्रात काल भ्रादिके समथ भ्ुगता है। इससे कार्तिककी श्रमावस्था भ्राम तौर पर निर्वाणशकी तिथि कहलाती है। भौर चूँकि वह रात्रि चतुर्दशीकी थी 8ससे चतुर्दशीको निर्वाणा कहना भी कुछ असगत

मालूम नही होता महापुराणमें गुणभद्वाचार्यने भी “कार्तिककृप्णपक्षस्थ चतुल्द्या निश्ात्यये” इस वाक्यके द्वारा कृष्ण चतुर्दशीकों राभिकों उस समय निर्वाणका होना बतलाया है जवकि रात्रि समात्तिके करीव थी। उसी सात्रिके अबेरेमें, जिसे जिनसेनने हरिवशपुरारामें “कृष्णभूतसुप्रभातसन्ब्यासमये” पदके द्वारा उल्लें- खित किया है, देंबेन्द्रो-ठारा दीपावली प्रज्वलित करके निर्वाणपूजा किये जानेंका उल्लेख है और वह पूजा धवलके उक्त वाक्‍्यानुसार अमावस्भाकों की गई है इससे चतुर्वशीकी रात्रिके अन्तिम भागमें भ्रमावस्था श्रा गई थी यह स्पष्ट जानी

भ० महावीर और उन्तका समय ११

प्राप्त करके भ्राप संदाके लिये भ्जर, अमर तया अक्षय सौख्यकों प्रात्त हो गये# + ईंसीका नाम विदेहमुक्ति, भ्रात्यन्तिक-स्वात्मस्थिति, परिपूरंसिद्धावस्था अथवा , निष्कल-परमात्मपदकी प्राप्ति है। भगवान्‌ महावीर प्राथ ७२ वर्षकी अवस्था » में अपने इस अन्तिम ध्येयको प्राप्त करके लोकाग्रवासी हुए और आज उन्हीका तीये प्रवर्त रहा है » इस प्रकार भगवान्‌ महावीरका यह सक्षेपमें सामान्य परिचय है, जिसमें : भय किसीकों भी कोई खास विवाद नही है मगवज्जीवनीकी उसय सम्प्रदाय- : सम्बन्धी कुछ विवादग्रस्त अथवा मतभेदवाली वातोको मेने पहलेसे ही छोड दिया है। उनके लिये इस छोटेसे निवन्धमें स्थान भी कहाँ हो सकता है दे तो गहरे पक विज अत 52/ 6:20 2200: िकटक कि,

' जाता है। और इसलिये अमावस्याको निर्वाण वतलाना बहुत यृक्तियुक्त है, उसीका श्रीपूज्यपादाचार्यने “कार्तिककृष्णुस्थान्ते” पदके द्वारा उल्लेख किया है # जैसा कि श्रीपूज्यपादके निम्न वाक्यसे भी प्रकट है -- “पद्मवनदीधिकाकुलविविधदुमसण्डमण्डिते रम्ये * पावानगरो्वाने व्युत्सगेंण स्थित मुनि ॥१द्षा कार्तिककृष्णस्यान्ते स्वातावृक्षे निहत्य कर्मरज अ्रवश्ेप सआपद व्यजरामरमक्षय सौख्यम॥१७छा” --निर्वाणभक्ति |

घवल और जयघवल नामके सिद्धान्त इन्‍्योमें भमहावीरकी आयु, कुछ आचार्योके मतानुसार, ७१ वर्ष महीने २५ दिनकी भी वत्तलाई है श्रौर उसका लेखा इस प्रकार दिया है--

गर्भकाल -- & मास दिन, कुमारकाल--२८ वर्ष मास १२ दिन,. जप्स्थ ( तपश्चरण )काल--१२ त॒र्ष मास १५ दिन, केवल(विहार)काल -- २६ वर्ष मास २० दिन) अल

इस लेखेंके कुमारकालमें एक वर्षकी कमी जान पढती है, क्योकि बह आम तौर पर प्राय ३० वर्षका माना जाता है। दूसरे, इस आायुमेसे यदि गर्भकालको निकाल दिया जाय, लिसका लोक-व्यवहारमें प्रहण नहीं होता तो वह ७० वर्ष

कुछ महीनेकी ही रह जाती है भ्रौर इतनी आगयुके लिये ७२ वर्षे बह आल थरुके लिये ७२ वर्षका व्यवहार

१२ जैनसाहित्य और इतिहासपर विशद प्रकाश

अन्ुसरधानको लिये हुए एक विस्तृत श्रालोचनात्मक निबन्धमे अच्छे उहापोह अथवा विवेचनके साथ ही दिखलाई जानेके योग्य हैं

देशकालकी परिस्थिति

देश-कालकी जिस परिस्थितिने महावीर भगवान॒को उत्पन्न किया उपके सम्बन्धमें भी दो शब्द कह देना . यहाँ पर उचित जान पड़ता हैं। महावीर भगवानूके भ्रवतारसे पहले देशका वातावरण बहुत हो श्षुब्ध, पीड़ित तथा सत्रस्त हो रहा था, दीन-दुवंल खूब सताए जाते थे, ऊँच-नीचकी भावनाएं जोरों पर थी; धूद्ोसे पशुओ-जैसा व्यवहार होता था, उन्हे कोई सम्मान या अ्रधिकार प्राप्त नही था, वे शिक्षा-दीक्षा भौर उच्चसस्कृतिके अधिकारी ही नही माने जाते थे और उनके विपयमें बहुत ही निदंय तथा घातक निग्रम प्रचलित थे, स्थ्रियाँ भी काफी तोर पर सत्ताई जाती थी, उच्चशिक्षासे वचित रक्‍्खी जाती थी, उनके विषयमें “न स्त्री स्वातस्व्यमहँति” (स्त्री स्वतन्त्रताकी अधिकारिणी नहीं ) जैसी कठोर भ्राज्ञाए जारी थी भौर उन्हे यथेष्ट मानवी अ्रधिकार प्राप्त नही थे-- बहुतोकी दृष्टिमे तो वे केवल भोगकी वस्तु, विलासकी चीज़, पुरुषकी सम्पत्ति अथवा वच्चा जननेकी मशीनमात्र रह गई थी, ब्राह्मणोने धर्मानुष्ठान आदिके सब के ऊंचे भ्रधिकार झपने लिए रिजव रख छोड़ें थे--दूसरे लोगोंकों वे उनका पात्र ही नहीं समभते थे--सवंत्र उन्हींकी तूती वोलती थी, शासनविभागमें भी उत्होने अपने लिए खास रिआयतें श्रात कर रबखी थी--घोरसे घोर पाप और वडेसे बडा अपराध कर नेने पर भी उन्हे प्राण॒दण्ड नहीं दिया जाता था, जब कि दूसरोको एक साधारणसे अपराधपर भी सूली-फाँसीपर चढा दिया जाता था; ब्राह्मणोके विगड़े तथा सडे हुए जाति-मेदकी दु्गन्धसे देशका प्राण घुट रहा था शरीर उसका विकास रुक रहा था, खुद उनके भ्रभिमान तथा जाति-मदने उन्हें पत्तित कर दिया था और उनमें लोभ-लालच, दम, अज्ञानता, अकर्मप्णता, कऋरता- तथा-चृततादि दुगु शोका निवास हो गया था, वे रिहवर्तें श्रथवा दक्षिणाएँ लेकर परलोकके लिए सटिफिकेट और पर्वाने तक देने लगे थे, धमकी असली भावनाएं प्राय छुप्त हो गई थी और उनका स्थान भ्र्थ-हीत क्रियाकाण्डो तथा थोये विधि-विधानोने ले लिया था, वहुतसे देवी-देवताभोकी कल्पना प्रवल हो उठे

भ० महावीर और उनका समय १३

शिशकीआकतही कल

उनके सन्तुष्ट करनेमें हो सारा समय चला जाता था और उन्हे पशुओकी ब्रलियाँ तक चढाई जाती थी, घर्मके नाम पर सर्वत्र भज्ञ-यागादिक कर्म होते थे और उनमें असख्य पदुझकों होमा जाता घा--जीवित प्राणी घघकती हुईं झागमे डाल दिये जाते थे--और उनका स्वर्ग जाना बतलाकर अ्रथवा 'विदिकी हँसा हिंसा भवति? कहकर लोगोको भुलावेमें डाला जाता था और उन्हे जैसे ऋर कर्मोकि लिये उत्तेजित किया जाता था साथ ही, वलि तथा यज्ञके बहाने लोग मास खाते थे इस तरह देगमे चहूँ ओर अन्याय-अत्याचारका साज्ाज्य था--वडा ही वीभत्स तथा करुण दृश्य उपस्थित था--सत्य कुचला जाता था, घम्मं अपमानित हो रहा था, पीडितोकी आहोंके धुऐंसे आकाश व्यास था और सर्वेत्र असन्तोप ही अ्सन्तोष फैचा हुआ था। यह सब देखकर सज्जनोका हृंदय तलमला उठा था, घामिकोकों रात दिन चैन नही पडता था धौर पीडित व्यक्ति श्रत्याचारों से ऊबकर त्राहि त्राहि कर रहे थे सवोकी ह्ृदय-तन्त्रियोसे 'हो कोई भ्रवतार नया' की एक ही ध्वनि निकल रही थी और सबोकी दृष्टि एक ऐसे असाधारण महात्माकी ओर लगी हुईं थी जो उन्हे हस्तावलम्बन देकर इस घोर विपत्तिसे निकाले | ठीक इसी _समय--भाजसे कोई ढाई हजार वर्षेसे मी पहले--प्राची दियामे भगवान्‌ महावीर भास्करका उदय हुत्ना, दिगाए प्रसन्न हो उठी, स्वास्थ्यकर मन्द-सुगन्ंध पवन वहने लगा, सजन घर्मात्माओ्रो तथा पीडितोके मुख्रमडल पर भाशाकी रेखाएँ दीख पड़ी, उनके हृदयकमल खिल गेगे और उनकी नस-ताडियोमें ऋतुराज ( वसत ) के आगमनकाल-जैसा नवरसका सचार होने लगा

मदावीरका उद्धारकार्य

- महावीरने लोक-स्यितिका अ्नुमव किया, लोगोकी अज्ञानता, स्व्रायपरता, उनके वहम, उनका अन्धविद्वास और उनके कुत्सित विचार एवं दुव्पंवहारको देखकर उन्हें मारो दुख तया खेंद हुआ साथ ही, पीडितोक्ी करण पुकारको सुनकर उनके हरृंदयसे दयाका अखड स्रोत वह निकला उन्होनें लोकोद्धारका सकेल्प किया, लोकोद्धारका सम्पूर्ण भार उठानेंके लिये अपनी साम्यंको तोला

१४ जैनसाहित्य और इतिहासपर विशद्‌ श्रकाश

और उसमे जो त्रुटि थी उसे बारह वर्षके उस घोर तपश्चरणके द्वारा पूरा किया जिसका भ्रभी उल्लेख किया जा चुका है। इतके वाद सब प्रकारसे गक्तिसम्पन्न होकर महादीरने लोकोद्धारका सिहनाद _किया--लोकमें प्रचलित सभी भन्याय-अत्याचारो, कुविचारों तथा दुराचारौके विरुद्ध आवाज़ उठाई--भौर अपना प्रभाव सबसे पहले ब्राह्मण विद्वानों पर डाला, जो उस वक्त देवके सर्वे सर्वा ' बने हुए थे भौर जिनके सुधरने पर देशका सुघरना बहुत कुछ सुखसाध्य हो सकता था भ्रापके इस पद सिहनादको सुनकर, जो एकान्तका निरसन करने वाले स्प्राद्गदकी विचार-पद्धतिको लिए हुये था, लोगोका तत्त्वज्ञानविपयक अम दूर हुआ, उन्हे अपनी «भूलें मालुमः>पडी, धर्म- झधमंके यथार्थ स्वरूपका परिचय मिला, आत्मा-अनात्माका सेद स्पष्ट हुआ और बन्ध-मोक्षका सारा रहस्य जान पडा | साथ ही, भूठे देवी-देवताशों तथा हिंसक यज्ञादिको परसे उनकी अद्धा हटी और उन्हे यह वात साफ जेंच गई कि हमारा उत्थान भर पतन हमारे ही हाथमें, है, उसके लिये किसी ग्रुप शक्तिकी कल्पना करके उप्चीके भरोसे बैठ रहना भ्रथवा उसको दोय देना अनुचित श्रौर मिथ्या है। इसके सिवाय, जातिमेदकी कट्टरता मिटी, उदारता प्रकटी, लोगोके हृदयमें साम्यवादकी भावनाएँ हृढ हुईं और उन्हे भ्रपने श्रात्मोत्कपेंका मार्ग सुर पडा साथ ही, ब्राह्मण ग्रुन्‍्भोका आसन डोल गया, उनमेंसे इन्द्रभूति-गौतम जैसे कितने ही दिग्गज विद्वानोने भगवान्‌के प्रभावसे प्रभावित होकर उनकी समीचीन धर्म देशनाको स्वीकार किया और वे सब प्रकारसे उनके पूरे अनुयायी बन गये भगवानने उन्हे 'गराघर के पदं पर नियुक्त किया और अपने सबका भार सौंपा | उनके साथ उनका बहुत बडा शिष्यसमुदाय तया दूसरे ब्राह्मत और अन्य धर्मानुयायी भी जैनधमंमें दीक्षित होगये इस भारी विजयसे क्षत्रिय गुरभ्ो और जैनधर्मकी प्रभाव-वृद्धिके साथ साय तत्कालीन ( क्रियाकाण्डी ) ब्राह्मश॒धर्मकी प्रभा क्षीण हुई, ब्राह्मणोकी शक्ति घटी, उनके अत्याचारोमें रोक हुई, यज्ञ-यागादिक कर्म मन्द पड गये--उनमे पश्ुओके प्रतिनिधियोकी भी कल्पना होने लगी--और ब्राह्मणोके लौकिक स्वार्य तथा जाति-पातिके मेदको दहुत वडा धव्का पहुँचा ! परन्तु निरकुझताके कारण उनका पतन जिस तेजीस हो रहा था चह रुक गया और उन्हें सोचने-विचारनेका अथवा अपने धर्म तथा

भ० महावीर ओर उनका समय

चर.

परिणतिमें फेरफार करनेका अवसर मिला

महावीरकी इस धर्मंदेशना और विजयके सम्बन्धमें कविसमप्राट्‌ डी० रवीन्द्रे- नाथ टागौरने जो दो जब्द कहे हैं वे इस प्रकार है “--

िगराभ्या2४ ए/0०९०गंग्रालदें 7 404 प5 प्राक०8० 7 इनेएशाणा 9४ एलाएणा) ३5० 769] थ्याते 702 ग्रादा८ 8008] टणारए्थाएं०0, (गर्ग: 89ए2४0४0०१ ०06 07 पाए ए४हु९ पर एपढ/जीहांणा, दया परण 707 0050शं78 06 ल्ाांगानों >हशात्प्राढ ऐ6 एण्राएप्रए, 2६ एथांडांए7 एच 70: 76820व. 20ए ए7एपशण एशंशददापइव०ा 37वें 7997 288 27 €ांशयाब] रतए.. करावाणए़ 0 एट४5, पड (९००ा- पाए 7णणातर 0एथणए०त ॥6 एक्प्रदड 0 7800९५ 209- 78 प्राधपराल बाते 00्रतुपदाठ्त पल जाए! णपण्ग्रााए,.. एऐ० 2 ॥णा8 एढए00 7्रठश (76 ॥ग्रीपघद्ा०6 हुद्ल०0ॉंए० (022८०:४ ०णाएंशलफ 5पएए6घघ्ल्त पद छीाग्रोग्राए 90५6०.

अर्यात्‌-महावीरने डकेकी चोट भारतमे मुक्तिका ऐस्ता सन्देश घोषित किया कि, धर्म कोई महज सामाजिक रूढि नहीं वल्कि वास्तविक सत्य है-- वस्तुस्तरमाव है,--और मुक्ति उस धर्ममें आश्रय लेनेंसे ही मिल सकती है, कि समाजक बाह्य आवचारोका--विधिविधानो अबवा क्रियाकाण्डोका--पालन करनेसे, भौर यह कि धर्मकी दृष्टिमे मनुष्य मनुप्यक वीच कोई भेद स्थायी नही रह सकता कहते आश्चर्य होता है कि इस शिक्षणने वद्धमुल हुई जातिकी हृद- बन्दियोको शीक्ष ही तोड डाला और सम्पूर्ण देश पर विजय श्राप्त किया। इस वक्त क्षत्रिय गुरुभोके प्रभावने बहुत समयके लिये त्राह्मणोकी सत्ताकों पूरी तौरसे दवा दिया था।

इसी तरह लोकमान्य तिलक आदि देवके दूसरे भो कितनेही प्रसिद्ध हिन्द विद्ानोने, अहिसादिकके विपयमें, महावीर भगवान्‌ श्रथवा उनके धर्मकी ब्राह्मण- धर्म पर गहरी छापका होना स्वीकार किया है, जिनके वाक्योको यहां पर उद्बृत करतेकी जरूरत नही है---प्रनेक पत्रों तथा पुस्तकोमें वे छप चुके हैं : * मह त्मा गाधी तो जीवन भर भगवान्‌ महावीरके मुक्तकण्ठसे प्रणसक बने रहे.

विदेशी विद्वानोके भी वहुतसे वावय महावीरकी योग्यता, उनके प्रभाव और उनके

१६ जैनसाहित्य भर इतिहासपर विशद्‌ प्रकाश शासनकी महिमा-सम्बन्धमें उद्घृत किये जा सकते हैं, परन्तु उन्हे भी यहाँ छोडा जाता है हू

वीर-शासनकी विशेषता

भगवान्‌ महावीरने ससारमें सुख-शान्ति त्थिर रखने भ्रौर जनताका विकास सिद्ध करनेके लिये चार महासिद्धान्तोकी--१ भ्रहिसावाद, साम्यवाद, श्ननेकान्तवाद ( स्याह्द ) और कमंवाद नामक महासत्योकी--घोषणा की है और इनके द्वारा जनताको निम्त बातोकी शिक्षा दी है ---

निर्भेय-निर्वेर रह कर शान्तिके साथ जीना तथा दूसरोको जीने देना

राग-हे ष-अहकार तथा भ्रन्याय पर विजय प्राप्त करना और पनुचित भेद-भावको त्यागना |

स्वतोमरुख्ी विज्ञालदृष्टि प्राप्त करके भ्रथवा नय-प्रमाणका सह्दारा लेकर सत्यका निर्ंय तथा विरोधका परिहार करना |

'अपना उत्थान भ्रौर पतन अपने हाथमे है! ऐसा समझते हुए, स्वावलम्बी बनकर भ्रपना हित भौर उत्कर्ष साधना तथा दूसरोके हित-साधनसे मदद करना।

साथ ही, सम्यर्दब्न, सम्यग्शान और सम्यक्चारित्रको--तीनोके समुश्चय- को--मोक्षकी प्रासिका एक उपाय अथवा मार्ग बतलाया है | ये सव सिद्धात्त इतने गहन, विशाल तथा महान्‌ हैं और इनकी विस्तृत व्याख्याओ तथा गम्भीर विवेचनाभरोसे इतने जैन ग्रन्थ भरे हुए हैं कि इनके स्वरूपादि-विपयमे यहाँ कोई चलतीसी वात कहना इनके गौरवकों घटाने अथवा इनक प्रति कुछ अन्याय करने-जैसा होगा और इसलिये इस छोटेसे निबन्ध में इनके स्वरूपादिका लिखा जाना क्षमा किये जानेके योग्य है। इन पर तो श्रलग ही विस्तृत निवन्धीक लिखे जानेकी जरूरत है। हाँ, स्वामी समन्‍्तभद्कके निम्न वाक्यानुसार इतना “जरूर बतलाना होगा कि महावीर भगवान्‌का शासन नव-प्रमाणक हारा वस्तु- “तत्त्वको बिल्कुल स्पष्ट करने वाला और सम्पूर्रां प्रवादियोके हारा अवाध्य होनेके (साथ साथ दया ( भ्रहिंसा ), दम ( संयम ), त्याग (परिप्रहत्यजन) श्र समाधि ।(अक्षस्त ध्यान) इन चांरोकी तत्परताको लिये हुए है, भौर यही सब'' उस्ेकी विद्येषता है अथवा इंसी लिये वह भ्रद्ठितीय है। '.. ! हक

भ० महावीर और उनका समय १७

दया-द्म-त्याग-समाधिनिष्ठ नय-प्रमाण-प्रकृतांजसार्थम्‌ अधृष्यमन्यैरखिलै: प्रवादेर्जिन त्वदीयं मतमद्वितीयम्‌॥6६॥ --युक्त्यनुशासन इस वाक्यमे दिया' को सबसे पहला स्थान दिया गया है और वह ठीक ही है जत्र तक दया अथवा अहिसाकी भावना नहीं तव तक सयममे प्रवृत्ति नही होती, जब तक-सथममें प्रवृत्ति नही तव तक त्याग नही वनता और जब तक त्याग नही तब तक समाधि नही वनती पूर्व पूर्व धर्म उत्तरोत्तर धर्मका निमित्त कारण है इसलिये धर्मम दयाको पहला स्थान प्राप्त है। भौर इसीसे “घर्मस्प मूल॑ दया? आदि वाक्‍्योके द्वारा दयाको धर्मंका मूल कहा गया है। भ्रहिंसाको परम धर्म” कहनेकी भी यही वजह है और उसे परम धर्म ही नही किन्तु 'परम ब्रह्म! भो कहा गया है, जैसा कि स्वामी समन्तभद्रक॑ निम्न वाक्यसे

“अहिंसा भूतानां जगति विद्वित ब्रह्म परम |”? “--स्वयम्भृस्तोत्र

झौर इसलिये जो परमश्रह्मकी आराघना करना चाहता है उसे अहिंसाकी उपासना करनी चाहिये--राग-द्वेषकी निवृत्ति, दया, परोपकार अथवा लोक- सेवार्क कामोमें लगना चाहिये मनुष्योमें जब तक हिंसकवृत्ति बनी रहती है तब तक झत्मग्ुणोका घात होरेके साथ साथ “पापा: सर्वेत्र शक्तिता:” की नीतिके अनुसार उसमें भयका या प्रतिहिसाकी आशकाका सद्भाव बना रहता है। जहाँ भ्यका सद्भाव वहां पीरत्व नही-प्तम्यक्त्व नही # और जहाँ वीरत्व नहीं- सम्यक्त् नही वहाँ आत्मोद्धारका नाम नहीं। अथवा यो कहिये कि भयमें सकोच होता है और सकोच विकासको रोकनेवाला है। इसलिये शआत्मोद्धार

* इसीसे सम्यगृहृष्टिको सतत प्रकारके मयोसे रहित बतलाया है और भवको भिथ्यात्वका चिह्न तथा स्वानुभवकी क्षतिका परिणाम सूचित किया है यथा--

“लापि स्पृष्टो सुदृष्टियं: सतभिर्भयेमंनाक्‌ |!”

“ततो भीत्याञजुमेयोइईस्ति मिथ्याभावो जिनागमातु

सा क् मीतिखदयं स्याद्धेतो: स्वानुभवक्षते! ॥? --परचाध्यायी

श्८ जैनसाहित्य और इतिहासपर विशद प्रकाश

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प्रथवा झात्मविकासक लिये अहिंसाकी बहुत बडी जरूरत है और वह वीरताका वबिह्न है--#यरताका नही | कायरताका आधार प्राय. भय होता है, इसलिये कायर मनुष्य अहिसा धर्मका पात्र नही--उससे अ्रहिसा ठहर नहीं सकती वह वीरोक ही योग्य है श्रौर इसीलिये महावीरके धमंमे उसको प्रधान स्थान प्राप्त हैं। जो लोग अहिसा पर कायरताका कलक लगाते है उन्होने वास्तवमे ग्रहिसाके रहस्यको समभा हीं नही वे भ्रपनी निर्बेलता और प्रात्म-विस्मृतिके कारण कपायोसे झभिभूत हुए कायरताको वीरता और पझात्माके क्रोधादिक-रूप पतनकों ही उसका उत्थान समभ बैठे है | ऐसे लोगोगी स्थिति, नि सन्देह बडी ही करुण[जनक है

5 सर्वोदय तीर्थ स्वामी समन्तभद्रने भगवान्‌ महावीर भौर उनके शासनक सम्बन्धमे और भी कितने ही बहुमूल्य वाक्य कहे हे जिनमेंसे एक सुन्दर वाक्य मे यहाँ पर भ्ौर उद्वृत कर देना चाहता हुँ और वह इस प्रकार है;--- सर्वान्तवत्तद्‌गुणमुख्यकल्पं, सर्वान्तशुन्य च्‌ मिथो5नपेक्षम्‌ सर्वापदामन्तकर निरन्त, सर्वेद्रयः तीथमिदं तबैब ॥६१॥ --युवत्यतुशासन इसमें भगवान्‌ महावीरके शासन अथवा उन्तके परमागमलकर-रूप वाकयका स्वरूप बतलाते हुए जो उसे ही सम्पूर्ण आपदाशोका अन्त करने वाला श्र सवोक अभ्युक््यका कारण तथा पूर्ण अम्युदयका-- विकासका--हेतु ऐसा सर्वोदय तीर” बतलाया है वह बिल्कुल ठीक है। महावीर भगवानुका शासन अनेकास्तके प्रभावसे सकल दुर्नवो तथा मिथ्यादर्शनोका भ्रन्त ( निरसत ) करनेवाला है भौर मे दुनेय तथा मिथ्यादर्णन ही ससारमें श्रनेक शारीरिक तथा मानसिक दु ख़रुप आपदाभोके कारण होते हैं इसलिये जो लोग भगवान्‌ मद्गाती रकें शासतका--- उनके घर्मका--आ्राश्य लेते हैं---वसे पुर्णातवा अपनाते हैं---उवके मिथ्यादर्दानादिक दूर होकर समस्त दुख मिट जाते है भौर वे इस धर्मंके प्रसादसे श्रपता पूर्ण अप्युदय सिद्ध कर सकते हैं। महावीरकी ओरो इस धर्मका हार सबके लिये खुला हुआ है ! जैसा कि जैनप्रत्योके निम्न वाकपरोसे ज्वनित है रा

भ० महावीर और उनका समय . -

(१) “दीज्ञायोग्याजयों वर्णाश्वतुथर्व विधोचितः भनोवाक्कायवर्माय सता: सर्वेडपि जन्तवः ८“उच्यावचजनश्राय: समयोदय जिनेशिनां नैकरिसन्पुरुषे दिष्ठेदेकस्तम्भ इवाज्षय: ॥” --यशस्तिलके,सोमदेव.

(२) आचारा5नवद्त्वं शुविरुपस्कारः शरीरशुद्धिश्च॒ करोति शुद्रन पि

£. देवद्विनातितपत्विपरिकर्मेसु योस्यान्‌ !? -पीतिवाबयासृतते, सोमदेव:

(३) “शूद्रोअप्युपरफराचारवपुः शुद्ध्याउत्तु ताद्श: |

जात्या दीनो5पि कालादिलव्धी झ्वात्मान्ति धर्मभाक॥”२-२श॥

“-सागारघर्मामृते, प्राशाधरः इन सत्र वाक्योका आय कमण इस प्रकार है---

(९) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ये तीनो वर्ण (आम तौर पर ) मुनिदीझञाके योग्य है भौर चौया थूद वर्ण विधिके हारा दीक्षाके योग्य है। ( वास्तव ) मन-वचन-ऊायसे किये जाने वाले धर्मेका अनुष्ठान करनेके लिये सभी जीप अधिकारी हैं '

'जिनेन्द्रका यह घम्म प्राय ऊँच भौर नीद दोनो ही प्रकारके भनुज्योहे

आश्रित है, एक स्तम्मके आवार पर जैते मकान नही ठहरता उध्ी प्रकर ऊँच-वी वमेंत्रे किप्री एक ही भ्रकारके मतुम्पसमुइक्रे आधार पर धममे ठहरा हुआ्रा नही है ।' --उश्नध्तिलेक

(२) मद्य-मासादिकके त्ागरूप आचारकी तिदोज्रता, ग्रह-यात्रादिककी पवित्रता और निल-छानादिके द्वारा शरीखाडद़ि ये तीवो प्रवृत्तिता ( विधिया ) शुद्रोको भी देव, हिजाति और तपत्वियोंके परिकर्मोके योग्य बना देती हैं

पड --नीतिवाक्यामृत

(३) भासव और वर्तत आदि उपकरण जिसके शुद्ध हो, मथ-मासादिके स्वायसे जितका आचररा पवित्र हो और नित्य स्तानादिके द्वारा जिसका शरीर शुद्ध रहता हो, ऐश छूद्र भी ब्राह्मणादिक वर्शोके सह धर्मका पालन करतंक्रे योग्य है, क्योंकि जातिसे हीन आत्मा भी कालादिक-नव्यिको पाकर जैनवर्मछा अधिकारी होता है “गंगा रघमाबूत

नोजने नीच कहा जनेवाला मउुष्प भी इस्त धर्मझ़ो घारण करके इसो

कि

२० जैनसाहित्य और इतिहासपर विशद्‌ प्रकाश

लोकमें श्रति उच्च बन सकता है &। इसकी दृष्टिमें कोई जाति गहित नही-- तिरस्कार किये जानेके योग्य नहीं--सवबंत्र ग्रणोकी पुज्यता है, वे ही कल्याण- कारी हैं, और इसीसे इस धर्ममें एक चाण्डालकों भी ब्रतसे युक्त होने पर ब्राह्मण! तथा सम्यम्दशंनसे य्रुक्त होने पर 'देव” माना गया है [। यह धर्म