२५8४१ : भ्धिस्थान भृगनक्तात्‌ छ्गनतात्‌ शे मन्मन श्री २, दा, श्वे स्थानहशप्ी करै 4२ सभिति रीन ते भि, २०४.

मै

पी वत्ति : अत्‌ १००० चार्‌ सन्त ¦: २४८३

(५४५ सन्त : २०१३ धस्य सन्‌ : १८५७ कः

६४ : ६युस्थान्‌ : ०य (तलत देनह भटित ण्य्‌ भारत तक णरेदीया उता दाङ शा मरोर पासि, २०७२.

श्री चमन शभु सदना स्यास्य

पूथ्य साल्मराम भलाराश्श्रीमे

६२५२ ४५8 > मर 3

२१

से. भ. ति. ५,>,

भरं

पूण्य श्रौ वाञ्वीलात मह्दन्नना मनाया णन्‌ सूत्रे, भष तेम्िन्चीन भतन्य्‌ा

४,

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मन्य भस्त्मप्येा॥ भासते स्प्यतन्‌ पद्धतिनणणा ३(त०८ ग्रद्सरे

१५०८

रपसा अनेना ग्मक्तिञ्धये।

2, ओन तेर धा = २८२९ ४। २३ श्री, गणि सरत्‌ भते, स्था, कैन

२०४८ : सरन लद्धर्‌ समिति,

ग्त्यषर्‌ सधम मलार पर्य श्रो

गः

श्री पाच च्थग पट्वी खपृती भास „+ द्श्पैलि सुने भग्‌ पडथी साती मलस 3 , तिपा स॑न्‌ यट माधवृती मलास » यार्‌ सुन्‌ भाग-१ भडथी, मृती मदास्‌ सनतषत भडवी गती मदा + सावन ट्वी गथृती भला ,; सवुत्तरोपपप(ति 3-८-०

» व्शाष्टुत्‌ रन्ध ७-०-०

» निरानदि& सने (गग बथा प) ७-<-०

१० +) धथवेऽलिञ नागर भीन ७-८-० ११ + §पासषषशय ८९ मप्रती = <-८-°

१२९ + सायारग भाग~२ पन्ने १०-०-०

१३ +, घ्शतेभते४ अगर णी सध्रती ९०-०-०

(खाल छप्‌ छे.)

श्र मायारंग जग-९ ते। पी मप्ती

+ निष सन

3 म्भनुवषटत्‌ 59

+ म्ानश्य 5

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+) स्प्याराग भ(ग-ञन्ने

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9 उप > छद पान

७४५५६ भष्टे तेयार्‌ छे

तराघ्यायन खन नन्द सने सेपता सन समवद्युग्‌ सुन प॒ भभ व्यसु स्लयेषगदर्‌ छन सयपसेख सखन स्थानाय सुन --___----~__

मेद-ध्डेप्परना श्रीद येह भादयुषदान्‌ भे. मड्त तरष्थी मेष सन्ना

भिदि मादे २. ३००० च्यु इत्वर समधतिमे ०, १०--५-५ धमि मण्या 8. भटे तेभना मलारी छी.

प्रस्तावना.

फपायचिप्न कमवन्ध से बन्धे हुए संसारी प्राणियों के दितायं जगत पिपी भगवान्‌ श्री वर्धमान स््ामीने श्रुतचाखिरूप दो भकार का धर्मं कटा हे 1 इन दोनों धमे की आराधना करने ब्राखा मोक्षगति को प्राप्न कर सकता हे, इसध्िये यृयश्ु को दोनों धर्मा की आराधना अबर्य करनी चाद्ये ! क्यों फि-“ घवानक्रियाभ्यां मोक्षः” सान ओर्‌ क्रिया इन दोनों से मोक्ष दोतादै। यदि क्षान फो दी किनेपता देकर क्रिया को गौण कर दिया जाय तो बीतराग- कथित श्रुतचासि धर्मं की आराधना अपूर्णं ओौर अपग मानी जायगी, ओर अपूणे कायै से मोक्ष प्राप्ति होना सवेया असंभव टे, एतदये बीतरागभणीत रख ओर सुबोध मागे निश्चय ओर न्यवदार दोनों नयो को मानना दी आवश्यक 1 कटा भी चे--

उयबुहारं व्रिना केचिद्‌ भ्रष्टाः केवलनिश्वयात्‌ निशयेन विना केचित्‌ , केषटं व्यब्हारतः ॥१॥

दवाभ्यां दृग्भ्यां भिना स्यात्‌ सम्यग्‌ द्रन्यावलोकनम्‌ यथा तथा नयाभ्यां चेत्युक्तं स्याद्ाद्वादिभिः ॥२॥

स्याष्टादके स्वरूप को निरूपण करने यारे भगवानने निथय ओर व्यव्हार, इन दोनों को यथास्थान आवहयकः माना हे नेसे दोनों नेनों के विनां यस्तु का अरछोकरन वराषर्‌ नदीं होता दै वैसे दी दोनों नयो के दिना धमं का स्वरूप यथाथ नदीं जाना जां सकता, ओर इसी कारण व्यवदार्‌ नयं के विना केवल निथयवादी मोक्ष मार्गं से पतित हो जाते भौर कितनेक- व्यवहारवादी केवल व्यवहार को ही मानकर धर्म से च्युत दो नाते दै।

आस्मा का ध्येय यदी है कि सर्वं कर्मसे शक्त दोकर मोक्ष प्राप्त करना

परन्तु उसमे कर्मा से टकार पानके स्यि व्यपहाररूप चाखिक्िया का आश्रय जरूर छेना पडता ह, क्यो कि भिना व्यक्हार के कक्ष्य की

कायसिदधि नरी दो सकती! जो ज्ञानमान्रही को भधान्‌ मानकर व्यनृहार क्रिया को उराते वे अपने जन्म को निप्फल करते नेसे पानीमे पडा हा पुरुप तैरमे फा ज्ञान रखता हया भी अगर्‌ दाय पैर दिखने रूष क्रियान करे तो बह अव्य ड्व दी नावा रै, जित प्रकार नाद्टरोजन ओर ओकसीनन फे मिश्रण पिना व्रिजछी प्रगट नरी होती उसी प्रकार इवान के दोते हुए भी क्रिया विना मोक्ष की भरापति नदीं सेरी, इसीटिए भगयानने

इस दकवैकाछिक खत्र धनिको क्ञानसदहित आयार ध्म के पाटन करनेका निरूपण किया

जेनाचायै॑जैनपर्मदिवाकर पूृज्यश्री धासीलारुजी मदारान सादवने द्कावैकालिकः घ्र छी आचारमणिमद्पा नाम की टीका तार्‌ करके स्मै साधारण पए ्रदवान्‌ नियो के अध्ययन के ये पूरणं सरलता कर दी दै, पुथ्यथी के दवारा नेनागमो की लिली हुई दीकाओंं मे श्री द्ावैकाटिक स्का प्रथम स्यान दै! इस के दश अध्ययन ई--

(१) पथम अध्ययन मे सगानने धर्म का खरूप" अर्हिसा, संयम ओर ठप बतलाया है } इसकी टीका धमे शब्द्‌ की ग्युत्पतति ओर शब्दा तथा अर्िसा, सेयम ओर तप का विवेचन न्िदरूयसे किया ह} वायुकाय- संयमके भरसंग मे, शनि को सदोरकयरखयदिका युखपर वाधना चाद्ये इस चात को भगवती खर आदि अनेक शा से तथा प्न्थो से सपमाण सिद्ध किया भनि के लिप निस्य भिता छेनेका विधान कथा भिक्षाके मधुकरी आदि छह भेदो का निरूपण किया है

(२) दूसरे, अध्ययन मँ संयम मागे विचरते हुए नदीक्ित का मन यदि संयम मासे यादर्‌ निकर जाय तो उसको स्थिर कनेक छथि रथनेमि ओर राजीमती के संवाद का वर्णन! पं स्यामी अत्यामी कौन दहे व्ह भी समञ्चाया है

(३) तीसरे अध्ययन मे संयमी भुनि को वायन ` (५२) अनाचीर्णोका

निवारण वतलाया मया हे, बयो कि वायन अनाची्े संयम के घातः इन अना्वी्णा का त्याग क्रे के व्यि आक्ञा निरद्त दे1

दे

(४) चौये अध्ययन मे-जो वायन अनाचीर्णी का निवारण करता वदी छद काया का रक्षक हो सकता हे इसख्यि छदकाय के स्वरूप फा निरूपण दथा उनकी रक्षा का त्रिरण नि अयतना कफो त्यागे यत्ना फो धारण करे। यतना माम बी जान सकता है जिसे जीव अजीव का ज्ञान है। नो जीवादि काज्ञाता है बह क्रम से मोक्ष को भप्त करता दे। पिख्टी अस्या भी चासि ग्रहण करनेवाला मोक्ष का अधिकारी दो सक्ता है

^ पांच अध्ययन मे काया का र्षण निस भिप्ना ग्रहणसे होता हे, अतः भिक्षा की विधि फी गई दे।

(६) चट अध्ययने "निस्य भिक्षा ठेनेसे अठारह स्थानोंका श्ाल्लानुसार आराधन करता ह, उन अठारह स्थानों का वर्णन है उनम सत्य ओर्‌ व्यव्हार भाषा वोरनी चादिये

(७) सातय अध्ययन “अटारदस्थानना का आराधन करने वाठ युनिको कौनसी भाषा वोटनी चादियेः इसके च्यि भापाओं का सरूप का गया है उनम सत्य ओर व्यवहार भाषा वोटना चाये

(८) आख अध्ययन म-“निरवध्य भाषा बोलनेवबाला पांच आचाररूप [१ निधान फो पाता है" अतः उस आचाररूप निधान का वर्णन 1

९) नवै अध्ययन "पांच आचार फा पाटन करने बाडा दी विनयक्ीक होता £ अतः विनय के स्वरूप फा निरूपण किया 1

(१०) दवै अध्ययन भ-“पदखे कदे हुए नो अध्ययनो में करी हुई बिधिका

पालन करने बारा दी भिक्षु हो सकता दै" इस किए भिक्षु के स्वरूप का वणेन किया दै

निवेदक समीर खमि.

;

(शी द्तैकाटिकषयका सम्मतिपत्र,) श्रीीरमौतमाय नमः}

सम्मत्ति-पत्रप्‌.

मए पेडियघुणि-देमचदेण पडिय-मृखयन्द्वासवारापत्ता पंडिय-रयण-षुणि~चासीरेण विरहया सकय-दिदी-मापािं छसा सिरि-दसवेयालिय-नाम सुत्तस्स आयारमणिमजूसा 'चित्ती अवरो- इया, इमा मणोदरा अत्थि, पत्य सदाणं अहसयज्ञत्तो अत्थो वप्णिञओ विउजणाणं पाययजणाण परभोवयारिया इमा: वित्त दीस ! आायारविसपए विन्तीकन्तारेण अआङ्सयपुव्वं उरो कडो, तदा अर्दिसाए सखूवं जे जदा-तदा जाणेति तेसि इमाए ॒विसीए परमल्यादो भविस्सह, कसुणा पत्तेयविसथाणे फुडरूवेण वण्णणे कड, तद्‌ सुणिण्णे अरदन्ता इमाए वित्तीए अवलोयणाओ अईसय- छन्ना सिज्छषइ ! सक्षयखाया खुत्तपयाणे पयच्छरेमो खुयोहदायमो अत्थि, पत्तेयजिष्णाखुणो इमा वित्त दष्ट्या ` अम्दाणं समाजे प्रिसचिन्ञ-षणिरयणाणं सन्भायो समाजस्स अदोभम्गं अत्थि, कि? उन्तविजसुणिरयणाणं कारणाओ जो अम्दाणं समाजो खुत्तप्पाओो, अम्दकेरं सादि कत्सप्पायं अत्थि तेसि पुणोवि उद्ओ भचिस्सह जस्स कारणा भवियप्पा मोक्लस्स -जोगगो भविनत्ता पुणो निच्चाणे पाविदिड अओ आयारमणि-मेजूसाए कुणो पुणो पुणो धन्नचायं देभि~ वि. से, १९९० फारमुन- इ-

ती उचञ्कषाय-जदण-सुणी,आयारामो (भलचर स्टेट) (वचनङञओो)

1 श्री दशवेखदिर सूनं सम्मति भन.

श्रमणु सधना भडन सव्याय मजम्‌ वारिधि सकतन्य्‌ सवतत कैनप्थय्‌र भृश्यश्रा सात्मा सम भ्रा पेद सम्मति भनने। युग्ध्यती मयुनाट,

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भे' तथ! परित नि इमय मे पइत भूक व्यास (नागौर मार याड वाखा) दर भणे] च्वि रल श्र. धायीत (न निरयित सन्त म्भे (इ. माना सइ = ध्थमेश्रविष सेली सणायार्‌ भविमःक्भूषा यकु सवदन ध्यु", मा छहर मनी छ. तेमां अखेऽ रण्टने। स्थं सारी रीते पिये भात्‌ सने समन्वनताभा मवेत्‌ 98.

तथ विके ममे साधरण शुद्धिननपसे। मदे भरम्‌ पर्‌ अस्वाननी ४, गीर सुनिना = सत्यार्‌ विषयने। साद इद्वेम रेद्‌ छ, रे ग्भृुनिष भतानतणी सटु-साना स्वद्‌ ते नथ ग्वयुता, यामां पप समरे तेमने भटे ६२५ शु न्यु छे तें स्री रीत भतिपाध्नम भेद छे. धत्ते सलन अव्ये विपये सरी रीते समभन्नयेद 8. सा नूत्ना २४२ चृत्तिश्रनी -सपूतिशय येष्यता सिद थाय छ.

म्मा भृच्तिभां से मील व्थचिपतः मे छे 3 भूत चलनी स्छत्‌ धया एनथी स्न सूलना पह भने पटन्छे€ सघष यर णनेल छ.

मये सततद्धमे मीशु सनतिन सवस्य इदु नेये. कधि शः षडेव. भारी सम(ज्छभा साना म्रक्नरना विद्यन्‌ अनि रस्तु दु मे संमभण्ध्यु सट्धालाज्य 9. यना विद्धान्‌ सुनि रतेन प्छ सप्वभाय सतव समा न्मते दुष्भ्राय्‌ मेच्ते वेप पमेदु स्त्य मे मन्नेना श्दीथा इध्य श्च. श्टनाथी मववितात्मा मेष येष्य्‌ णन्चे सते निर्वाय चने पमे. सा भष ममि। पृत्तिकषरने नारतर्‌ धन्यकाह ग्णरपीर, छीर.

विभ सवत्‌ १६८८० प्व्युन २४4. } ४४ धन्०्८यपय कुण

पुस्स भगणन।र सखी भायारमे। (०५५५२ र्टः) खन

#

जैनागमवेन्ता जैनधर्मदिवाकर उपाध्याय श्री १००८ श्री अत्मारामजी महाराज तथा न्याय उ्याकरण के ज्ञाता परम पण्डित सुनिश्री १००७ श्री हेमयद्रजी भदाराज, इन दोनों मद्ात्माओंका दिया इजा श्री उपासकदशाङ्ग सूचका प्रमाण पत्र निन्न प्रकार रै-

सम्मदइवतं

सिसिवीरनिव्याण-संषच्छर २४५८ आपो (पष्णमासी ) १५ सुक्वारो छदियाणाम।

मए एुणिदेमचंदेण पंडियरयणधुणिसिरिथासीराल्ग्रिणिम्मिया सिरिउवा- सगघ््तस्स अगारधम्परसजीवणीनामिया चित्ती पंडियमूलचन्दवासाभ अनोर्धतं सुया, समीरणं, इयं गित्ती जहाणामं तहा शणेवि धारे, सर्च, अगाराणं तु इमा जीषेण ( संनमजीचण ) दा एव अत्थि 1 वित्तिकसुणा मूल्छुत्तस्स भावो उज्जु- सेीगो फुडीकभो, अहय उवासयस्त सामण्णप्रिसेसधम्मो, णयसियवायधाो, कम्मपुरिसद्रवाभो, समणोवासयस्स धम्मदढत्ता य, इचाश्विस्या अरसि फुडरीईभो बष्णिया, जेण कलुणो पडदाए सुुप्पयारेण परिविओ होड, तह इइहासदिष्िभोवि सिरिसमणस्स भगव महावीरस्स समए वटृमाण-मरहवासरंस कतुणा विसय प्पयारेण चित्ते चिचिते, पुणो सकयपादीणे; द्रमाणकाठे दिन्दीणामियाए भासाए भासीणं परमोवयाये कडो, इमेण कदुणो अरिहत्ता दीसई, कलुणो एयं कलं परमप्पसेसणिज्जमत्थि) पत्तयजणस्त मञ्जत्थमावाओ अस्स सुत्तस्स अवोयणमर्व खादप्पये, अवबिड सावयस्स तु (उ) इमं सत्यं सव्वस्समेव अत्थि, अभो कल्तुमो अणेगकोडीसो धन्नवाओ अत्थि, जेदिं अच॑तपरिस्समेण जइणजणतोवरि अीमी- यारो कंडो, अदय सावयस्स वारस नियमा पत्तेयजणस्स पदणिञ्जा अत्थि, जें पदाकओ वा गदणाओ आया निव्वाणादिगारी भव, वहा भमियव्वयाबाभो पुरिसक्षारपरकमव्रायओो अत्स्पमेव दंसणिल्मो, गरंबहुणा इमीसे विक्तीए पत्तेय- वरिसयस्स फुडसंेहिं वण्णणं कयं, नई न्नोपि एवे अम्हाणं पञुत्तप्पाए्‌ समाजे विन्नं भवेज्जा तया नाणस्स चरिततस्स तहा संघस्स खिप्पं उदयो भषिस्सई, एवं ईं मन्ने॥ मवईमो-

-उवञ्ज्ाय-जङ्णमुणि-भायाराम, प॑चनई ओ,

सम्मतिपत्र

{ भापान्तर्‌ )

श्री ब्रीर्‌ निर्ण सं° २४५८ आसन शुक्ला (पूर्णिमा ) १५ शुक्रवार छंधियाना

शने ओौर पंडितखनि देमचन्दजीने पंडितरत्नछनिश्री घासीलाल- जीकषी रची हुई उपासकदश्ांग सुच्रकी गृस्थधर्मसंजीचनी नामक टीका पंडित मृखचन्द्रजी व्याससे आग्योपान्त खुनी है यद्‌ घृत्ति यथानाम तथारुणवारी-अच्छी चनी-है ! सच यद्‌ गृदस्थोकि तो जीवनदघ्री- संयमरूप जीवनको देनेवाटी-टी है दीकाकारने मृलसत्र के भावको सरल रीतिसे वर्णन किया रै, तथा आ्रावकका सामान्य धमे क्या? अर विोप धर्म क्या रै इसका खुलासा इस टीकामें अच्छे दंगसे चतलाया है स्याद्वाद्का स्वरूप कम-युरुपा्थ-वाद ओर शरावकको धर्मक अन्द्र ददता किस प्रकार रश्वना, इत्यादि विपयोंका निरूपण इसमें मलीर्मोति किया है इससे दीकाकारकी भरतिभा खच द्वरकती है) देतिदासिक दणिसि श्रमण मगान्‌ मदावीरके समय जेनध्म किस जादोजरारी पर था ? ओर वतमान समय जेन धमं किस स्थितिमें पट्॑चा ? इस विपयका तो ठीक चिच्र दी चित्रित कर दिया है 1 फिर संस्कृत जाननेवाठोंको तथा दिन्दीभापाके जाननेवारोको भी पुरा लाभ दोगा, क्योकि टीका संस्कत है उसकी सरल हिन्दी करदी मई इस्यके पठनेसे कर्ताकोौ योग्यताका पता लगता है कि दृत्तिकारने समश्चानेका कैसा अच्छा प्रयत्न किया हः दीकाकारका यद कां परम प्रदंसनीय है इस खच्नको मध्यस्थ भावस पठने वालोको परम खाकी धरापषि दोमी क्या कदं आ्रावकों (गृहस्थो) का तो यद्‌ सत्र सर्वस्व दी ई, अततः टीकाकारको कोटिशः धन्यवाद्‌ दिया जाता रै, जिन्दोने अत्यन्त परिश्रनसे जेन जनताकिः ऊपर असीम उपकार किया दहै 1 इसमे श्रावकके चार नियम प्रत्येक पुसपके पठने योग्य हँ, जिनके प्रमावसें अथवा यथायोग्य ग्रहण करनेसे आत्मा मोश्चका अधिकारी दोता है तथा चितव्यतावादं आर पुरुपकार-

.

षराक्रमवाद्‌ द्रएकको अवश्य देखना व्याहियै कटांतकर कं इस टीकां प्रत्येक विषय सम्यक्‌ प्रफारसे चताये गये हमारी खक्प्राय (सोई हरसी ) समाजे अगर आप जसे योग्य चिद्धान्‌ किरि भी कोई होगे तो ज्ञान चारित्र तथाश्रीसंघका हीध उद्य रोगा, पेसामं मानता

आपका उपाध्याय जैनमुनि आरंमाराम पंजाबी,

५००००००५९०००

इसी प्रकार लादोरमे विराजते हए पण्डितव्यं विद्वान्‌ खुनिश्री १००८ श्री भागचन्द्जी महाराज तथा प, सुनिश्री चिलोकचन्दजी मदाराजके दिये हए, श्री उपाशकद्शाद्गं सत्रके भ्रमाणपच्रका दिन्दी सारांदा निन्न घकार दै-

श्री श्री स्वामी घासीलालजी महाराज कूल श्री उपासकदद्णाङ्ग खत्रकी सस्त टीका माषाका अवलोकन किया, यह्‌ टीका अतिरमणीय भनोरक्षक है, इसे आपने चडे परिश्रम पुरुपार्थसे तैयार किया है सो आप धन्यवादके पाच्च है आप जसे ज्यक्ति- योकी समाजं पूर्णं आवद्रयक्ता है आपकी इस टेखनीते सभाजके विद्वान्‌ साधुचमै पढकर पूर्णं लाम उछाेगे, दीकाके पठनेसे हमकी अस्यानन्द्‌ ह्वा, ओर मनमें पेसे विचार उ्पन्न इए कि हमारी समाजं नी देते ख्ुयोग्य रज्ञ उत्पन्न होने लगे-यद एक हमारे लिये षडे गौरवकी थात है] चि. सं. १९८९ मा. आश्विन कृष्णा १३ वार भौम लाहोर.

श्री ज्ञा्ताधमेकथाङ्क सूत्र फी अनगार ध्मीऽपृततरपिणी ` टीका पर्‌ जेनदिवाकर सादित्यरत्न जेनागमरत्नाकर परमपूज्य श्रद्धेय जैनाचार्थं श्री आत्मारामजी मटाराजका सम्मतिपत्र सटधियाना, ता. ४-८-५१.

भने आचार्यश्री धासीलालजी म. हारा निर्मित (अनगारःधर्माऽपृत-वर्षिणी' टीका बाछे श्री ह्ञाताध्मेकयाङ्क भूत्रका धनि श्री रनचन्द्रनीसे आधोपान्त श्रवण किया।

यह निःसन्देह कहना पड़ता है क्रि यह टीका आचार्यश्री घासीखालजी म.ने कड़े परियम से लिखी 2। इसमे भत्येक शब्दका भरामाणिक अर्थ ओर कठिन स्यो पर सार-पू्णं तरिवेचन आदि करई एकं गरिरोपतायं हं मूक स्य्छोको सरल यनानेमे काफी भयत्न किया गया है, इससे साधारण तथा असाधारण सभी संस्छृतज्ञ पाठको फो राम दोगा देखा मेरा विचार है 1

नै सखाध्यायमेमी सज्जनो से यह्‌ आक्षा करेगा क्रि वे रृत्तिकारके परिपरम को सफक वनाकर शाघ्मे दीगई अनमोल रिक्षा्यो से अपने जीवनक शिक्षिते करते हए परमसाध्य मोक्षको प्राप्त करेगे 1 श्रीमातजी जयवीर

आपकी सेवम पोट द्वारा पुस्तक भेज रदे ह॑ ओर इसपर आयाये- श्रीजीकी जो सम्मति वह इस पत्रके साथ मेन रदे दै पटुचने पर समाचार देवरं

श्री आचायैश्री आत्मारामजी म. उने सुख शान्िसे पिराजते पूज्य श्री घासीलालजी म.सा. ठउनेको हमारी ओरसे बन्दना अर्मैकर सुखशाता पूरे 1

पूज्य ध्री घासीखालनी मनी का रिखा हुमा (रिषाकघून) महा- राजश्रीजी देखना चादते दं इसख्यि कोपी आप भेजने की ढ़पा करः फिर आपको धरापिस भेन देेगे 1 आपके पासनहींहो तो जहां से मिटे

वहसे कोपी जरूर भिनवाने का कष्ट करं, उत्तर जस्द देनेशी कृपा कर स्य्योग्य सेवा छिखते रं

सटधियाना ता. ४-८-५१ निवेदक प्यारेखाङ जेन

श्मीश्नै स्वामी प्रासीखरडी खदहाराज कृत श्री उपासकददाङ्ग सघ्की संस्कृत दीका भनापाक डवरोकन किया, यह्‌ टीका

से आपने चे परिश्नम्‌ पुरपा्ैसे पालन ईद} जप जसे व्यत्त

सोष्ठे खमाज पूर्णा खावद्यक्ला हे \ उापकी इस छेखनीसे समाजके त्विदयात्‌ सा उटविगे, टी दम उल्यानन्द्‌ दुवा, आनते पे ध्वव्यार उस्न हुए कि टम

ति. सं. १९८९ पा. आए्विन ष्णा १३ वार म्यम सादर.

११ श्रीः

नेनागमवारिभि- जैनधर्मदिवाकर-जेनाचारय-पूज्य ग्री आत्मारामजी- 9 = [> महाराजनां पशचनद्‌-( पंनाव )स्थानामलुत्तरोपपातिकग््राणा- दम्‌- मर्थचोधिनीनामकटीकायामिदम्‌-

सम्मतिपत्रम्‌.

आचार्यैः श्री घासीलालमुनिभि; सङ्कङिता अदुत्तरोपपातिकभू्राणामय- चोधिनीनान्नी संस्कृतत्तिरुषयो गपूयेकं सकटाऽपि स्वक्षिप्यषुखेनाऽधरावि मया, इयं हि एत्तिुनिवरस्य बेदुप्यं प्रकटयति श्रीमद्धि्युनिभिः सृत्राणामथन्‌ स्पष्टयितुं यः प्रयत्नो व्यधायि तदथेमनेकशो धन्यवादानर्दन्ति ते! यथा चे्यै इत्ति छा सुबोधिनी तथा सारदत्यपि अस्याः स्वाध्यायेन निर्वाणपदममीष्षु- भिर्नि्ौणपदमनुसरद्धिक्तीन-दशेन-चास्िषु परयतमनिधुनिभिः ध्रा्रकेध ज्ञान दशन-चास्तरणि सम्यक्‌ सम्पराप्याऽन्येऽप्यात्मानस्तत्र प्रबवेयिष्यन्ते

आशासे श्रीमदाशुकविभनिवरो गी्षणवाणीजुपां विदुपां मनस्तोपाय जेनागममूत्राणां साराववोधाय अन्येपामपि जेनागमानामिस्थं सरलाः पुस्पष्ठाश्च एतीषिधाय तांस्तान्‌ भू्प्रन्थान्‌ देवरभिरा सुस्पषटयिष्यति

अन्ते (्रुनित्ररस्य परिश्रमं सफखयित्त सरखां छुवोषिनीं चेमां सन्तति स्वाध्यायेन सनाययिप्यन्त्यव्रश्यं॑सुयोग्या दंसनिमाः पाठकाः . इत्पा्ास्ते-- किक्रमाच्द्‌ २००२ श्रावणदप्णा भतिपदा उपाध्याय ञात्नारामो जेनसनिः 1

लटृधियाना, ेसेही ~

मध्यमारत सेलाना-निवासी शओ्रीपान्‌ रतनलालजी खेखी श्रमणोपासक जैन लिखते दं कि -

श्रीमान की की हुई टीकावालां उपासकद्ांग सेवक के दृणि- गत हुवा, सेचक अमी उसका मनन कर रहा है यद्‌ ग्रन्थ सर्वाग- सुन्दर पवम्‌ उच्स्यकोटि का उपकारक है \

१०

जैनागमवारिधि-जेनधर्मदिवाकर ~ उपाध्याय ~ पण्डित-घुनि श्रीजात्मारामजी महाराज (पाव) का आचाराद्गसघ्र की आचारचिन्तामणि रीका पर सम्मति-पत्र

ने पल्य आाचार्थवर्यं श्रीघासीलालजी (मदाराज)की धनाद आ्रीमद्‌ आचाराद्सत् के प्रथम अध्ययन की आचारचिन्तामणि टीका सम्पूरणं उपयोगपूयैक खुनी 1

यद्‌ टीका-न्याय सिद्धान्त से युक्त, व्याकरण के नियम से निषद्‌ हे तथा इसमे प्रसंज्ग २पर क्रम से अन्य सिद्धान्त का संग्रह भी उचित सूपसे माटूम होता है

टीकाकारने अन्य सभी विषय सम्यक्‌ प्रकारसे खट क्यः तथा प्रौढ विपयों का विरोपरूप से संस्कत भाया में स्पष्टतापूर्वक प्रतिषादन अधिक मनोरंजक है, एतदर्थं आचार्य महोदय धन्यवाद के पाच्च र)

नै आरा करता कि-जिक्ञाखु मदोद्य इसका -भरीर्मोति पठन द्वारा जेनागम-सिद्धान्तरूप अष्धत पी-पी कर मन को दर्षित करेगे, ओर इसके मनन से दक्त जन चार अचुयोगों का स्वसूपज्ञान प्वगे तथा आएचायेवयं इसी रकार दूसरे भी जनागमों के वि्ाद विवेचन द्वारा श्वेताम्बर -स्थानकवासी समाज पर भान उकार कर यद्ास्वी वर्नेगे पि. सं. २००२

जेनघुनि-उपाध्याय आत्माराम पणर उदि

खुधियाना ( पैना ) -; # {-- शुमपस्तु॥ वीकानेरवाव्ा समाजश्चूषण हाखरन्न मेरुद्रनजी रोठिआनो अभिप्रायं =

आप जो दाख्ञका कायै कर रदे इं यद यडा उपकारका कार्थं इससे जनजनता को काफी लाम पर्हुचेगा.

(ता, २८-३२-५६ ना पत्रमांथी)

१३ भरी उपासदक्ा्र मूच परत्वे जेन समाजना अग्रगण्य जैनधर्मभूषण

महामन विद्वान संतोए तेमज विद्वान श्रावकोए्‌ सम्मतिओ समर्पी छे तेमना नामो नीचे भरमाणे चे,

(१) चछथियाना- सम्बत्‌ १९८९, आधिन पूर्णिमा का पत्र, शरतक्षान के , भंडार आगमरकर जेनधर्भदिवाकर श्री १००८ श्री उपाध्याय श्री आत्मारामजी महाराज, चथा न्यायन्पाकरणवेत्ता श्री १००७ सच्छिष्य भरी धनि देमचन्दजी महाराज,

(२) खादौर-व्रि° सं० १९८९. आग्विने घदि १३ फा पत्र) पण्डित रर भी १००८ श्री भागचन्दजी महाराज तथा तच्छिप्यं पण्डित रत्न श्री १००७ श्री तरिोकचंद्जी महाराज,

(३) खिन से ता. ९-११-३६ छा पतर, क्रियापान्र स्थविर श्री १००८ श्री भारत श्री समरथमखनी महाराज,

(४) वालायोर-ता. १४-११-२६ का पन्न, परम प्रसिद्ध॒ भारवरनन भरी १००८ श्री क्षतायरधानीजी श्री रवनचन्दजी महाराज,

(५) चम्बरद-ता. १६-११-३६ का पत्र, प्रसिद्ध कवीन श्री १००८ भी मि नानयन्द्रजी मदाराज,

(& आगरा-ता, १८-११-३६, जगत्‌ बहम श्री १००८ श्री नेन दिवाकर श्री चौथमखजी महाराज, गुणवन्त मणीजी ग्री १००७ श्री साहित्यमेमी शरी प्यास्चन्द्जी महाराज.

(७) देद्रायाद (दक्षिण) ता, २५-११-३६ का पत्र, स्थिव्रषदभूषित

भाग्यवान पुरूष श्री सार्च्दजी महाराज तथा प्रसिद्ध क्ता श्री १००७ श्री समागमलजी मासान.

८) जयदुर-ता, २६-११-३६ का प्र, संप्रदाय के गौखर्धक शंत स्वमावी श्री १००८ श्री पूज्य श्री खुूचचन्दजी महाराज,

(५) अम्बाला-ता. २९-११-३द का चत्र, परम परतापी पंजाव केदरी भरी

१००८ श्री पूज्य श्री रामजी सदाराज,

१२

निरयावछिकाषूलक्रा सम्पतिषत्र, आगमवारिधि-सर्तन्तस्वतन्जेनाचारय-पूज्यभरी आत्पारामजी महाराजकी तरफ का आया हवा सम्मतिपत्र खधियाना, ता, ११ नव्रम्बर ४८ श्रीयुत शुलायचन्द्जी पानाचदजी साद्र जयजिनेन्द्र पत्र आपका मिला ! निरयावलिका विपय पूज्यश्रीजीका स्वास्थ्य ठीक होने से उनके रिप्य प. श्री हैमचन्द्रजी महाराजे खम्मति पश्र सिख दिया है जापको सेज रष ! करूपया एक कोपी निरयावलिकाकी ओर भेज दीजिये ओौर कोद योग्य सेवा कार्यं लिखते रहं १!

भवदीय,

गुजरमल-वलखवतराय जैन 1 सम्मत्तिः

(ठेखक नेनघनि पे, श्री देमचनदरनी मदारान) खन्द्रबोधिनीदीकया समलङकतं हिन्दी-ग्रमापालुवाद्‌सदिते श्रीनिरयावलिकासघ्रे मेधाचिनामल्पमेधसां चोपकारकं भविष्यतीति शुदे मेऽनिमत्तम्‌ , संस्करुतरीकेयं सरला खवोधा सखल्लिता चात एव अन्वर्थनाम्नी चाप्यस्ति } खुविशदत्वात्‌ खगमत्वात््‌ भरत्येकदुर्बोधपद्‌- व्याख्यायुतत्वाच टीकेषा सेस्कृतसाघारणक्ञानवतामप्युपयोगिनी माचिनीत्यनिरनि दिन्दी-यजैरभापायुवादावपि एतद्‌ भाषाविक्ञानां महीयसे छाभाय भवेतामिति सम्य संभावयामि लेनाचायै-जेनधमेदिवाकर-पूज्यश्ची घासीराख्जी महाराजानां षरि श्रमोऽयं प्रक्ंसनीयो धन्यवादा तै सखुनिसत्तमाः। एवमेव श्री समीरमटजी-श्री कन्देयालालजी खुनियरेण्ययोमियोजनकार्यणपि छ्य, ताचपि खनिवरौ धन्यवादा स्तः शुन्द्रपरस्तावनाविपयासुक्रमादिना समलङ्ते ख्ररत्नेऽस्मिन्‌ यदि त्तः स्या दि र्‌ चरतरं स्यात्‌ यतोऽस्यावर्यकतां

पाठका; त्रस्यास्याध्ययनाध्यापनेन छखकनिसोज परिश्रम सषछलपिष्यन्तीत्यारास्मदे } इति शसा

१५ श्रीमान्‌ न्यायतती्ं पण्डित

माधरारजी खीचन से छिखते फिः-

उन पंडितरत्र मदाभाग्यवंत पुम्पों के सामने उनकी अमाध- तत्वगवेपणां के विषय में नगण्य क्या सम्मति दे सकता हं

परन्तु :--

मेरे दो भिं ने जिन्दनि इसको कुख पडा है बट्त सराद्ना की दै वास्तव में रेसे उत्तम सवके समञ्चाने योग्य ग्रन्थों की बहुत आवश्यकता अभैर इस खमाज का तो देस ग्रन्थ ही गौरव वदा सक्ते ई-ये दोनों भ्रन्थ वास्तव मे अदुपम है पेसे मन्धरत्नों के खुप्रकाश से यद्‌ समाज अमावास्या के घोर अन्धकार में दीपावली का अयुभव करती हु महावीर के अमूल्य वचनों का पान करती हुई अपनी उन्नति में अग्रसर दोती रहेगी 1

4 +, ~; & :-

ता, २९-११-३६

अम्यारखा (पजा) पत्र आपका मिला श्री श्री १००८ पजाच केतच्तारी पृज्य श्री काद्री- राणि लदाराज की सिवः में पट कर सुना दिया \ जापकी नेजी हु उपासकद्राङ्ग खन्न तथा गरटिधर्मकर्पतर की एकं प्रति भी प्रक्ष हई दोनों पुस्तके अति उपयोगी तथा अत्यधिक परिश्रम से छिखी हई ई, देसे भ्रन्यरलों के प्रकाशित करवाये की चडी आवश्यकता 1 इन पुस्तकों से जेन तथा अजेन सयका उपकार दो सकता है 1 आपका

यद्‌ पुस्पं सरष्ट्नीध हे }

आपका शशिमृघण इएस्री अध्यापक जेन हाई स्कल अम्बाला चादर.

१४

(१०) सेखाना-ता, २९-१९-३६ का पत्र, श्वो के श्ञावा भीमान्‌ सतनरारुजी डोपी,

(१९) खौचन-ता. ९-११-३६ का पत्र, प॑डिवरत्न न्यायी इुश्रावकर श्रीयुत्‌ माधवलाटजी,

९८००००0 9०००७०

ता, २५-११-३६ सादर जय जिनेन्द्र आपका सेजा हुवा उपासक दांग घ्र तथा पन्न मिता यहां विरा- जित प्रवर्तक वयोवृद्ध श्री १००८ श्री ताराचेदजी महाराज पण्डित श्री किंदानलाल्जी महाराज आदि ठाणा १६ खख कांती मै विराजमान आपके वहां विराजित जेनाच्राचार्य॒पज्यपाद्‌ श्री १००८ श्री घासीखल जी महाराज आदि उणा नव से टमारी चन्दना अञ कर सुख शांति पूछे आपने उपासकदचांग सघ के विषय में यां विराजित शखनिवरों की सम्मती मेगा उसके विषय मै वक्ता श्री सोभागमटजी मदाराज ने फरमाया है कि वक्षमान मेँ स्थानकवासी समाज मे अनेकानेक विद्वान शुनि महाराज मौज्‌द है मगर जनश की दृत्ति रचने का सादस जसा चासीखार्जी सदाराज ने किया है वैसा अन्वने करिया हो एेसा नजर नदीं आता दसरा -यद्‌ शाख अत्यन्त उपयोगी तो यों है संस्कत पराछरूत हिन्दी आर गजराती मापा होने से चारो भाषा वाले एक ही पुस्तक से छाभ उखा सक्ते है जन समाज मेँ देसे चिद्वानों का गौरव बे यही श्रु कामना है आशा कि स्थानकवासी संघ विदानों की कदर करना खीखेमा योग्य चिस दोषश्ुभ 'मवदीय जसनाखाङ रामखार कीमती

६) सागरा सेः- श्री जेनदिवाकर भ्रसिद्धवक्ता जगदवह्भ चुनि श्री चोधमख्जी

सदाराज पेडितरल्न सखुव्पाख्यानी गणीजी श्री प्यारचन्द्‌ जी मदाराज ने इस पुस्तक को अतीव पसन्द की दै

१५ श्रीमान्‌ न्यायतीर्थं पण्डित

माधवखाजी खीचन से छिखतते किः-

उन पंडितरत्र मद्ाभाग्यवंत्त पुरषो के सामने उनकी अगाध- तत््यगवेपणा के विषय में नगण्य क्या सम्मति दे सकता हं |

परन्तु :--

मेरेदो भिन्ने जिन्न सको कछ पदा वदत सराना की है वास्तव में देसे उम सवदे समच्राने योग्य ग्रन्थों की बहुत आचरयकता है ओौर इस समाज कातो सा ग्रन्थ ही गौरव यडा सक्ते हये दोनों मनन्थ वास्तव में अयुपम पेसे ग्रन्धरत्नों के खुपरकाश से यद्‌ समाज अमावास्या के घोर अन्धकार मँ दीपावली का अनुभव करती दुई महावीर के अमूल्य वचनो का पान करती हई अपनी उन्नति में अग्रसर दोती रहेगी

$, ~; & :-

ता. २९-११-३६

अम्धालखा (पजा) प्र आपका मिला श्री श्री १००८ पैजाव केरी पूज्य श्री काडी- रामजी महाराज की सेवा में पदं कर खुना दिया। आपकी भेजी हुई उपासकदशाद्न खघ्न तथा गरदिधर्मकर्पतस की एक प्रति भी प्रप्त हई दोनों पुस्तके अति उपयोगी तथा अत्यधिक परिश्रम से लिखी हई ई, ठेसे ग्रन्थरतो के प्रकारितत करवाये की बडी आवश्यकता इन पुस्तकों से जेन तथा अजेन सवका उपकार दो सकता आपका

यद्‌ पुरपार्थं सराद्नीय है

आपका शरिभूपण शाखी अध्यापकः जेन दाद स्कूल अम्बाला छाद्र.

१६

शान्ह स्माद प्रएग्य मूं तत्व बारिथि, धर्यबान श्री जेनाचाय॑ पूञ्यवर्‌ श्रीश्री १००८ श्री खुवचन्दनी महान सादेवने सत्र श्री उपासक दशङ्गनी को देखा 1 आपने फरमाया कि पण्डित शुनि धासीखालनी महाराज ने उपासक दशाद्ग भूव टीका ल्खिनेमे वडा ही परिभम करिया! इस समय इस पभ्रकार प्रत्येक मूर्नोी संशोधक पूरैक सरल टीका ओर शुद्ध दिन्दी अलुवाद्‌ होने से भगवान निप्न्थों के परवचनं के अपू रसका लाम मिल शकता दै,

[१

वालाचोर से भारतरत्न शतावधानी पंडित घुनि श्री १००८ ध्री रतमचन्दजी महाराज फरमाते ह॑ कि :-

उत्तरोत्तर जोतां मूर सुनी संस्छृतटीफाओ रवयामां टीकाकारे स्त्य भयास कर्यो ठे, जे स्थानकवासी समान भटे मगररी रेवा जेव ठे, घी कसंचीना श्रौ संवे सारा कागरुमां अने सारा टाहपमां एुस्तकं

छपाभ्री प्रगट कर्य छे जे एक धकारनी साहित्य सेवा वजावी ॐ, वम्ब्र्‌ कशदेर विराजमान कवि पुनि श्री नानचन्दजी महाराजने फरमाया कि पुस्तक सुन्दर हे प्रयास अच्छा खीचन से स्थविर क्रिया पात्र मनि श्री रतनचन्द्जी महाराज ओर्‌ पेडितरतर शनि सश्रयमलजी महाराज श्री फरमाते दै कि-विद्रान मदात्मा शरुपोका प्रयत्न सराहनीय वया जिनामम श्रीमद्‌ उपासक दशाङ्ग सज

की टीका, एवं उसकी सरल बोधनी शुद्ध हिन्दी भाषा बडी दी सुन्द्रता से लिखी &ै।

१७ श्री घीतरामाय नमः॥

श्रीश्री श्री १००८ जेनधर्मं दिवाकर जनागमरत्नाकर श्रीमञ्जेनाचारभ भरी एञ्य घातीलाख्जी मदाराज चरणवन्दन स्वीकार टौ

अपरश्च समाचार यह हे वि आपके मे दए शाघ् मास्टर सोमालाटजी के द्वारा भरा हुए, एतदर्थ धन्यवाद ! आपश्रीजीने तो एसा कार्य किया दै नो करि हारौ वरपौः से किसी भी स्यानकयासी जेनाचाय ने नदी किया

आपने स्थानकवासीजेनसमान के उपर जो उपकार किया है वह कदापि भुलाया नहीं जा सकता ओर नदीं शकाया जा सकेगा

हम तीनों छनि भगवान मदादीर से अया शासनदेव से परायना करते कि आपकी इस बन्नमयी ठेखनी फो उत्तरोत्तर शक्ति प्रदान करे तां किं आप मेन समाज के उपर ओर्‌ भी उपकार करते रद ओर आप चिरस्ीव दौ

हम आपके छनि तीन

उदेपुर. नि सव्येनद्रदेव-ूनि ख्खपतराय-शुनि पद्मसेन

&

इतवारी वाजार नागपुर ता. १९-१२-५६ पखर्‌ विद्वान जेनाचा्यं सुनिरान श्री घासीखालजनी महारानहयारा नो आगमोद्धार हुआ ओर दो रदा हे सचयुच महाराजश्री का यद स्तुत्य कायै हे दमने परचारकजी के द्वारा नौ गरतं का सेट देखा ओर कड्‌ मार्मिक स्थरलोको पा, पद कर्‌ विदधान ्निराजघ्री की शुद्ध श्रद्धा तथां टेखनीके प्रति हार्दिक भप्नननता पडी 1 चास्वव्‌ म॑ निरा श्री जेन समान पर ही नदीं शवर समान पर भी महदा उपकार फर्‌ रदे दह ज्ञान किसी एक समान फा नदीं होता वद समी समान की अनमोल निधि दै जिसे कठिन परिथम से तैयार कर जनता के सम्धुख रक्खा भा रहा दै जिसका एकः एक सेट दर शदर गांव ओर घर्‌ घर मे होना आवर्यकदै। साहित्यरत्न = मोहनघुनि सोहनषनि जेन.

१८

श्रभयु सधना अयाद्‌ भद्रौ पन्नण शरी १२२०८ अभय.६९ कपर०८ से्र रण्ननिरमा प्थद्रदा इता स्यरि सेमल वरधयी शासने भटे भणि मलिप्राय.

ध.

शसोद्धर समिति सच्छथी पेलयपाट श्‌ विपि पषति स्वभा धसादाल) भद्यकदतय श्ोदधरतु मे भ्यः धधे ते क्ष्य नेत्‌ अभा तेभ भास ४रीने स्थनञवासी केन समान्ते भे भूरानूत्‌ मद्रि स्यूनी ०८ मन्युत्‌ इरननाछु 8,

२०८ भचर अय्‌ः मति अशस्नीयषछि भि षदे व्यश्ितमे तेमः यथष्ित सेष् रेन पथस ग्लसय्त, छे स्मे वेधा से सगीरय कय रल्यथी वद संपूयुपयु पार्‌ ५/8 श्य मने ऋता शचुतसानने। दम्‌ मेणवी श.

#

हदीयायुदी, गदायन्‌ षम्‌ ख्याय ६्२६.६९ ८१२०८ सत डेमन्‌। सूने, समध किन्थारेो नभम, चार भिदी सार धीर

पथय १६ सन्‌ भनरश्र धत्यीदाल@ भडारण तथा उविशी ऽनेयालाद ९२०८ हि थायु छती, सनभ

ग्भमटनाह छ्यु उपास्रयय सनि धयनद्छना १०८ भ्रयिषात,

२५।प सेत याथुप्से। खण समाधिम इरे। निरत्‌र धमरध्यन्‌ धमिधनभा वन ९२५. सत भशन अय त्वरीत्‌ थय सेवा सानन श्ये तथा सायारमि

मे मे भग्‌ मषु 4४ पूण सुर, सण सने (तन्नेति सभि च३े तेव 8. सथ्य सये वनन यल समे सथ श्ये अशन थाय

शवनधयथु तेने सिसेष्‌ वस्‌ रे भते पूत स्प्यः युद्देचने पमे भेताये। इतरन्य्‌/ 8 समे स्‌ २०८,

स्मास शह १०; भःगणनादर त्‌ा. २-१-९०-पप्‌

खवः उनः शप्ता धन्छतेा, ध्या सुनि सुप,

१९

धवीयायुदी संअहयना त्‌ रत्नै भायः भदारारते। सिय श्र

रघुधुर्‌ त, १८-९२-१८पप्‌ पश्वयपा सनभरवर्‌ पद्विरत्‌ पृथ्नय श्री धासीदातदछ भलर माहि निकदेनी सेवामा, याप सक्‌ सण्‌ समाधीमां षये.

चरून्‌ अधशनयु अभ्‌ खुर श्त न्वलौ त्यप्‌ जनह, सपन अशीत ययल देरव सूतर। मेया. सघ सने चरत लिदधातना व्यायते रती पट्विरतनेने मिव यथं पड तेषा 8. सूल अश्द्यनलु अम्‌ सरिति पृषु धाय सने सानि मलमनन साल्महव्यालु रनामा स्धनमूतत्‌ यय्‌ मेर म्म्यर्थना, वी. स(्तिरल भाणगप््धयारी ५. शर स्ट *जरण्ड्नी सयस(र शान्तिनीना पयन्तं स्वीये,

०१।. ११-१५-५६ वीरभगपभ

गग्छाधिपति पूष (२०८ श्री सानव्यद् भदह्ारप्ना सधयत स्पत्माधी, हियापान, प्रत्त) सतिश्री समरथमत भडारानत्‌। मलिभाय,

प्ीयनथी सवत्‌ त, ९१्‌-र-पद्ना पत्थ उप्त.

पूल््य सव्याय धपसीदल भञरन्छना इस्त के सितनषतु लणष्यु सदर ममन स्था सवाम थाय छे, स्त्यः पत यलनिश्री समस्य मरय) सभय येष्ठा भलनने आरण सपू नेष छया नथी, छत रण्डः सस्त नेदु पे णषु = सेषट्‌ स्ने भन सपय दमये 8. ते वमयु सते चु्‌५ लगे छ. सद्त्य धदेऽ वामे नयता येष्य छे. सभां २य।५४८दस्‌] समान्ननी अदधा) अर्पय सने द्स्सषयुनी दवता शासय छ. स्यार श्र सपूलः पदिश्रम लं समान उपर मड्न इष्‌ भरे 9.

ल, 21२५८न&।4 १४२८० भद २. 'ण्ीयन.

२०५

द्ीमदा सजययना सदनी ( यनी श्रा २९।५५९९ म८२७ने! सलिभ्यः

श्र वातरण्टेपे-सानमयारते तीर्थ नम्‌ गल माधवा निभित्त ४३९ छ, शान्‌ भयास रवान्‌, अरनाम्‌ ससय रनर, मने सेने सुमन मापनद सनन(दिय्‌ ऽभते क्षय उरी वण सवने अत्‌ दी परमपद भविक्षरी भने छे. शाखस-परम्‌ २८, ने समम्‌ पूख्यश्र धातत = भहरा/ पेते स्मविश्रान्पद्य साननी, पाथना सने तेनी अननना सने नि अ्रसेजेभां पथु री २६५ छे. ते भे तमेष सनेधशः पन्यवाह्ता सूयिष्णदरी छे, व्निय 8 तेभनी सन म्रजानननी धयश धयु मरमाद्सिते स्वुरसीय छे. केम भृश्यश्री धपय.) भखरत्छ भेत्‌ सनभ्रथार्‌ मा सनिश्रषन्त्‌ प्रयतत रे 9. तेम शायद समिन कयना ४। पयु मेम साय रीम्‌ पे पवित्र सेना श्री २४५ छे. ते पथु मरेमर्‌ धन्यनाह्ना पूषयु मयिशरी छि.

समिति अर्यते भ्परी सेक सयना छे -

शास्र ५२ प्ति मभि सत्‌ धसी भडार रे शास्रं ४५२ शरी २३६ 9. तेभ संय उरन्‌ मद्धे-पद्ति। विगर भये रे भ्यो २३६ छ. तेने यदय, गणन भे सड सरथ ४३ ऊषम. मेना मयि भादी खयन छे :-श्प्खोद्धार समितिन जभ्य अयप्वाड्छेण-तने णनी शे ता भअरथम भेत्‌ मने मन्न से तयु ग्वयुषमेत युण्र्त, सोरण्द्रेः समते अन्छमः अनपय धरी भेभ्य, मनये, ममन सा सद्य नेमे.

प्म मभल्यास्नी परिस्थिति (रिषम छ. व्यापारी, धारने २४४ व्यन्‌ सप्यनना पयु खश्डेत णन्या छे. छत्‌; ने समावत भर््ये। अनसि नसम सा गदर भयः सक्र ॐ. येनो भने छ.

सभार्य स्लुदरणता नाथ शखोदधतरलु &। भयु तध सरलताथ श. पूरनयश्री धासीलात2 मष्यसन/ न्या सुधी, मा चच नियर छे त्या सुधामा मेमनी शस्तिने। केशे, लाम वेचपय तेच्ते। दध देवे अप्य सरष्टा चद नमत रषवथी तेने ऽये ०७।२ (विसनमन्‌। धच्छा भती पय्‌ ते। शान्तस ओह रनम विनती, सदी समद्यनदद परान्न स्पते स्यु-खुशचणता सन्मम नयु नकन स्थिता &रचाने, तेमनी, भसे शषसयदारवु आम्‌ षुः छन वेषु मेषे.

ये वभवम्‌ न्नमन्नेधयुरमा शसो अमी मणनानी छे. ते नभते ठपस्वी स्ुयना [सियाराम ता दी.

२१

शी शोप सूष्यश्री श्वीदम्दछ भससन्छमे सेमली सा सेका सने मरम्‌ अव्यालुष्ररड भवृति भटे सारवान मदिन्त ठ. श्पसननायष्ट इन तेमनः श्वरेशीने सशक्त सने दरधय रणी समय पमप्नी चुने वधु सेना दी र. भरु. आातुर्मस स्थल. वी" ६. स. २०१० श्रषनणु १६ १३. २३, सन्य केननि सयदाल

श्र वमन्‌ सि अदप्यना पक्र मुनय मेखारा०्छतेा स{सिन्य

शप विशार पूय मायाय मलदा श्री वसीत मल्रन्श्रमे केन ग्पभमे। इपर सेचत 9र४\ वमद च्येठ ठ. ते भटे तेष धन्यनाने 9. पिभ स्पण्येा यसन स्व्तत्‌ सो् स्यीनि स्थानछवासी केन समाज्दयुं ओदन वपासु छ. सममे, उपरी तेमनी सख्त वा सप्ता भने जाननी य्व्ि ध्णुर खर 9. सष्टूतं श्यना माधय तेम सदर नञरे यथी युञ्‌ छ, निदानम्‌ पेम केन्‌ समन्पना स्फययि) उपध्यये। व्ञेरे श्यो उपर स्येदी मा सदत्‌ स्थगय ४६९ धवी मेधसे यने अस्ना सेडर भपय नेमे.

स्मदा मेद्न्‌ अमां पषतिकत्यं पूय श्री धासरीदाह महदा मे भयम्‌ श्ट स्या छे ते सतोऽ छे. तेमु सायम्‌ उपखी सपे क्रे स्व्यवायु सभोय अयः शीघ्र सद्र याय मेर शरणा सपय. स्भ्यवा १५. २२-४-५६ रमित खि १७६९ भ्यर्‌ ग्यति

कपत यहप्यना सडसती सरहण्यषं स्नप्मीतेा म्मद्व्तिय लभतर ता. २य१--४-प श्रीमा सेह शतदा भगणसिसं भसु सड्ण -ममद्‌ मरत्‌ श्व. स्था. रैन श्ास्रोद्धार सममिति शा, प्म्मद्न

ग्प्मेः सने सनयुदूनी एप सणदरून सीमे, विमो यत्पनी समिति दष्ट पुश्य ग्मध्याय्‌ मर्दान्ण श्री धीद्तदद भटर सष्टण रे खतरु अय्‌ इरे पे चैदं सतप्मायी उपास दद्य स्न्‌, म्मत्यरय ग्ण परिपषदिञ

२५

णडा सेहभनो सलनही 2 खन ्र| २९५६१५९ भदारागनने। म(मिञय्‌

श्र वातराग्देपे-सनभयारमे तीर्थ नम्‌ जन्‌ नाधवादु (नमि ४86 छ, सन्‌ म्यार ४रनार्‌, उरनं सेय रनर, सने तेने वुमन स्ाभनर सनन अममे कय 8री-डेनण समनम्‌ भ्प्व री परमपध्ना स्वधिश्रौ मने छे. शखस-परम्‌ शान्त, गमने समममाटि पून्यश्रीा वायीदाद ७२ चेते म्भिश्रान्तेपलु सनन इपद्चना सने तेनी अजनन्‌ सने विट प्रसमं पथु री २९५ छ. भे तमश मनेः धन्यनाध्ना सपिष्नारा छ, ननिय ४े- तेना, असननना, धम्‌ धयु म्रमाद्मिनि, भलुष्टस्सुय ठ, सेम, भूरयनर धाचीदल@ मद्र चेते सानभयार भटे सविश्रन्त्‌ अयान्‌ रे छ. तेम शसोद्धर समितिना अनादा पयु समा सरयु रीन मे भविन सेना ४री २३६ छे. ते पयु णपदेमर्‌ धन्यनाहना चूष्य सशरी छे.

समितिन। अर्यश्यने भारी से$ सुयना। :-

शासेदधरछ अनर पटति सममा सत्‌ धसा भजार रे शास्र 1२4 श्म री, २३५ छे. तेभ संखय उरना भटे-प्ति। निगदेन भटे रे भयो ४४ २३९ ४. तेने पटाय\ १८न। भटे सद्‌ सरथु गोध, सेना भटे मारी भे सय :-शासो।२ संमितिन। य्य आयवाड्डेए-नने मना श्छे अयम

पेते सने णीन्न मे चयु गुम युष्णरत, यैरष्दर सने उन्छमा अनास री शेभ्णदे, णन मने स्विः सड भेण,

स््यप्टनी परिव्थति (वम्‌ छ, न्यायाद), पपा्चरीञन २८५

व्यन्‌ सायनना पयु सश्डेत्‌ ण्या छे. छता न्ने सलाक्ति यृङ्स्ये। अनसि नीडे ते ०३२ अय ञे. सेनी भते श्रद्धः छ.

समर सवुषणता यनथा ससोदवस्वं अम्‌ पथु नषु सरदतथ्‌ा यप २, पूरम्यश्री धासालदर मखपन न््यः सुधी मा कर वियरेे चा खधामा मेमन श्विना »८३। लास तेय तेरे, वेदे. अद्य सोरा्दरेम्‌ नघ नभत गेडन्धथी तेभने, इये ण्यर्‌ (निररनन धन्धा यत, ते। शान्तिम ओह सेनमे विनती, उरी समदना पवरानना, मत्‌ चसया-सचुष्ूवता यन्मम न्यु नप्नी स्थिरत। शस्वान तेमनी, धपते यप्र अम्‌ मूषुः ४२९ वेतु मधम,

येष्ड चथतभा ग्वमनेधसुर्मः शोधस अभीर मणननी छ. ते नभते कथरी, सुयन्‌। (वयासय्‌ ता दीक.

रद्‌

सात्मा सान जरयसि पमरप वद्ैतने विद््रीव सथ्ये, धन्य छे सापे सते समि(तिन। अयानि सभ्‌ (व्यान मष्ट द्चरधनी पयु प्रला र्या वमर्‌ सपन दयन्‌ अन्य सात्मामेनि सापता निभत्तरेप युधं सद्या छ, न्मन समर्थ निदान पमेधी सपू धय युट्‌ शरावः तेना गाश छ.

सेन लि. णरदाधा सश्रद्ययन्‌। विह्षी भासती भेधीना्ठं रेवामी न्‌( ध्ररमनथी वी, येदीद्यन्न गदस्तसा्ध-धशध्

स्थानत केन्‌ सधना अञ्चण, #

ग्पधतेन्‌ "प्धतिने सपनावनार्‌ = बडषटरा छतेरा खे (विदान पोङ्ेभरने। म५५य,

स्थानी सअदमयना अनिश्री धीत भडार केतशाखोना संच्छत्‌ गकम, शुर्पताभ्‌ा सने (इदम भवदे ४्वदन। धयु विट श्र्यभाः न्यपति य्येव छे. शपे चेष्रे > यदो असिद्ध भयात ड्ध मेध श्ये छ, अनिश्री पेते सद्ष्टत, सधमागधा (ईद्‌ मापना निष्युत्‌ 8, मे सेभते। दुः पस्थिय धस्त सड व्यु सत्‌ छे. शादु सपादन उस्नाभां तमने पतान, शिष्य नगा ने निशम्‌ त्रु पस्तिनिा स्ञ्धर्‌ भव्ये षे, ते मोर्धं भने मान यये, स्यानषटनासी सपरदषयन्‌। स्रसेम भदते>े/ सदधर मेणयी प्‌, सनिश्रीना धयन्‌ सरणा जने िप् मनाण्यु छे. स्थनषवास्ची समण्नमा विदत वली भटी छ, ते (दमय, भू(दप४ श्येतणर चमर्‌ सनध्यष्वनाः भति(नधिमेना धषु सेभयथी पदिययम। मनत इः निदधन भय नगर, शटी शु, प, मखराननेा म्भा अयसत व्थानहृ्मसी सद्या अथम्‌ सेवा भरी भन्यता 8. सच्छत स्प्वीश्रला सपा समापना मान्या छे, साना युद्ध मेम इः यास शटी शष छ, शुग्णत अपतद पथु ने सरण येल छे, भने (िन्धास् छे 3 म९।२०८- श्री स्‌। प्दुघ्य अयासने केनसमानछ (त्तन्छत स्मच सले शाद्धोना लावान पायनादयम मने इदटधुभामः नसना श्य ते अमा न्यनस्था श्ये.

तापय चङ्‌ ७६।२ ३२५६1 (इमतराम्‌, प्‌. २७-२-१८५६ मेभ. भे.

२२

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सभन शुदधानाना = मात्मामि। स्वपरना सिद्धी निणालस्‌ = भवनामे ग्नतेष्न्‌ ते। स्मा सल् स्थानषवाय सभा भप स्प्भूद मने 1.1 वेना 8 मेघे मन्य ग्मालमामेनि दयन ४द्‌' छु" समर पेतपतन धरम कसावानी सहर तते खध्ये। आरण साना युद पवित ने स्वपर पर मे युष्यीद्ष छत, भणन्‌। यशेठ 8 सा अयने सपशर स्था समितिना मन्य अर्थये रे शम्‌ तथं रहय ठे तमा मष्न नेन्म्रादु अस्य मेनाम स्वे णे से ०६६ धन्यनाह६ मेर

शारहपमाध स्वमी भमत संश्रधय

परनाणा सम्रहपयन। (वट्पौ मास्त मधान स्नपीने। सल्िश्राय

४५४५४। २७-१-५६ श्रीमन सेड शन्तीदात्‌ गणदपसल्

भसु २० अर श्वि स्था० कनशस 8२ समिति {क . 1]

स्र णीरक्ता चुन युन्ना लर भसति विद्वा मेधानषठ सनम तथा दीप्रं स्वन सदिकया मन्ते समशताम। मीरे छे मापन स्यन्‌ स्मभभत्‌ म्मनस्थामा रद निन्त मानने मेण धमृ्यान्‌ स्ये २१।३॥

निथेषमा भने पूश्नय सत्यायू मारा श्री धासीलतह यडराच्ना श्येल\ नर+ मठं चेव धनखल तर्य सेर तरी भणेदा सखम, तमाभ्‌ ग्योडपान मान्या भनन्‌ ञ्य सने किया ते सुतः स्थनए्नासाौ समान्ते म्भे वतिसग भप्यनौ पूणन्ण इनन्‌ णनातनार्‌ छे तेम मापण अद। मन्दी न्य्‌ रपय भेदी छे ते मपपदु। समान मे जोर वेनः रेषु सभाग

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म्भा सपर मेत पट्वी नन्दे मस्रन्श्रीनिा सन्त्‌, मधमामधी, इन्द चथ युग्यती भषामे। उपरता यसाधारण अ्छु च्ल मवे ४. म्मे पथु नपा भर्सन्छश्रीथा सम्मलु नथी. सापस न्मलीमे छीमि ष्टे मे सत्रि स्य मने भ्रथम्‌ उना छि. तेनी चस्य ययीर, व्याप यने छवनने ततस्पशीः छ, मार्डा ग्न सने सर्य सूतेः भावतस्‌ धायचादाद भदन रना स्य एन ञुनिरछने इये थाय छे ते प्पयु। यटमजा्य छ. यत्नाद्‌ स्ने मीतिषवाहना वमानम्‌ वन्या धममानना सेत्तरती, न्य्‌ छे सेव्‌ वभत माना तत्वसन सव्या्मिषताधी भरेत सुता सरो सपामां सपातर ष्देछ छसु, ययव सने स्धष्ने मागद्यड यर षडे तेम ठे. कित्‌ सन्‌ कैनेचर) निद्धप्न सने सप्धारछु भयस, साधु मते श्चन षदेभते सभश्यु परे तेनी स्पष्ट, सस सने शुद्ध भपमा सता दमनामां मान्या ठे, मडारन््श्रीते व्यार मेध्ये व्यद तेभना सा धयम सद्णयेद नेधमे धामे. मे §परथी यनिश्रीना भरिमन्‌ ५य३न पन्‌ शद यय तेभ छे. तेभ्यः वन्‌ सतरिषमा वयु गयु 8.

सुनिश्रीना स्‌ स्मसाधारलु अर्यमा चेताना रसित्येते तथा पट्तिने। स८्२ भव्या छे. भते गाश छठे मे द्रे अयन युरूषेने केतना चरमां वसाने सन्‌ पेता छवनने सवया स्ुणने भागः वणे त। भरा ्रीमे वेदेः ऋरम्‌ सपूयुपयु २४८ यथे.

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धमः ५९ ३।६०८

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शः सुतष्च सने ६।९४/परभ भेदा सला, सिनप्सर ञ८डरन्स तथा दघ मेलनभरं भे1४चप्वेञ ३२,५,

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१४

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पुगयत्यन्‌ः श्र पयीहत्दछ भद्रे केयर धये८। स्याम्‌, दशतेकवी४ गमावर्य४, 6पासष्व्शम नेद सरः ममे मेया, सत्रि उपर सदध्तमा भष् म्मापनाभां यना 8 मने स्ये सपय इद सने यन्ती भापाततद्ि पथु स्प्पयाम ग्मान्यु छे. सस्त दध ते युग), तथ, दुद समति मेत सध्ययंश्रना ये मापा परना ऊेसरणा मसाधारथु भजुलनी सया सने सरेण घय चे. ग्भ सल अथेमां पने पति अगर यती मायर्युन्नीना सभ्रतिम्‌ विदधता सश्च पेष्‌ ४. युय तथा दद्मः धये नर्मातरम्‌ भमान चयि, मने सरणत्‌। तेथपान छे. मेध्‌ =विदह्न्छन्‌ समे सधारयु भधुस्‌ उमयते संते स्पे म्भेवी सेभनी विनीनी प्रतीति भय छे. 3२ च्तिपमाथी इश १३ सतरः अभर थया छे. घीन्म दूना दमने तेयद गया छे, मा सूने न्वरे भेभने ये तेयार्‌ यने अगर थये स्मदि देन सूज-सस्त्यमा समूह्य पतति गलसे सेच सशय नथी. स््यायश्री मा भड्न्‌ अयने देन समाक्नेा-तिदेषत्‌ : स्थानेन, समण्ण्नेष, से पूय सभर स५४ रडथे मेन्‌, समे मा सभी छीमे.

रमुचः ्धीमनलाद शड्‌ सेर उनि एतन ओ. णरध.

भ्र तारा रमण २५७, सेीय। उषे युमा

शः रागधरनी, धन अषठे०८न। तरेर = सद्ेणमे। गण्य, ०२२९।ल्‌ न्वगनाध्‌ पेष

२०९, १,८-४--१६

भूल्यत्यायौ प, सेनि श्री वचाल नस्ञरन् ने देन्‌ समभव भि

मे$ सन्ध अमां ज्याभ्व्‌ येना छे & रे समान भदे णहु उम्यम्‌ "इय, अनिश्रीे तैयार धरें प्यायय, व्थयेञलकि, श्र विषण्ुत (न. भे मेय

२७

नवथ नय, चने प, श्र. धयीलादछ्छना मनप सूने, नेतः सी करने पानी भय तेभ छि धनोर्समधमे तेम स्थानणवासी समभे सेव मका श्र पत्रीलावॐ भ. पसेभू सेवी ते णरणर द्ूणीभूत्‌ धयेत्‌ ठ.

श्री वमन्‌ श्रमयुदधना मायाय श्री आल्मरानछ भञ्जरे श्री धायीनपय मदसचन चपः मदि मास मशसः उदी सवभति मम्ल नते उपस्थ % श्री धात भ. सत्ती (षयोमित्तनी जानी श्च.

म्भ, शूत्र विक्रान, सज्यासयीनि तेभ सामान्य्‌ कायछने समने मि सरणी, रीत पयुणी थम परे निध्रप्ूप्ने तेम सज्यासीने तथा सिन्ध गी विपचे रीन उषया थय तेम छे स्याद समान्य दद नयने (द

ग्ण न्ने शुष्ध्यतः चयते योश्धरादीः सोवुचाध्यी स्प्ु म्ल स्िसणतथी २११५२ त्वय

वद्धे भयः प्रभे सूम, कल्थनप्यु स्पषु नड भून ग्पयणुने समन्नय्‌ नड. प्रम्‌ तन्‌ प्रये ठ. णण शधषणु श्रास्रीय सुस्व धवत सूतेः सामान्य्‌ वयद्‌ पयु धल सव्णतथी समन्नष् न्धय छे, स्पभन्य भप्रयुस्‌ पयु श्र तेरह भप = भ, भष्ठावीरे ते वमतथी दे सप्पम (थः मागधी भवाम) समे मनवेल ए, मेरे चमः भयत समभन्छवाभ धुः ९५ छ,

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